हुस्न


हुस्न की हर नजाकत, एक राज है,
जब पर्दा गिरता है, टूटता ख़्वाब है.

परमीत सिंह धुरंधर

दीवाना


पतंग जो टूट जाए धागे से,
लौट के फिर उन हाथों से नहीं उड़ता.
ये सच है,
मैं आज भी दीवाना हूँ तेरे हुस्न का,
पर तेरे लौटने की दुआ मैं अब नहीं करता.

परमीत सिंह धुरंधर

दिया और चाँद


चाँद मिल जाए तो फिर,
ताउम्र काट जाए चांदनी में.
पर मेरी मान,
रोज नया दिया जलाने में भी नशा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कालेज में एक लड़की


एक लड़की,
एक लड़की.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
भोला-भला चेहरा,
कातिल अंगराई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
खुली जुल्फें, और
थोड़ा शरमाई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
किताब दबाये सीने से,
पलकों को झुकाते आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
चलती है ऐसे रुक-रुक के,
जैसे बदली कोई छाई है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
कल से जाएंगे हर लेक्चर,
देखें, किसकी किस्मत में आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.
एक लड़की,
कालेज में आयी है.

परमीत सिंह धुरंधर

बाढ़


खौफ बढ़ चूका है, दीवारे ढह चुकीं हैं.
मंदिर और मस्जिद दोनों सुनसान पड़े हैं.
वो निकलीं है आज सज के, सवर के,
बूढ़े भी अब ईमान छोड़ चुके हैं.
गली, चौरास्ता, छत, पेड़, खुलेआम,
हर मोड़ पे भीड़ बढ़ चुकी है.
हर सख्श पसीने से तर-बतर,
दिल की धड़कने थम चुकी है.
वो निकली हैं आज अपनी जुल्फें लहरा के,
बढ़ई, लोहार, धोबी, हलवाई,
जोरू, गोरु, सब काम छोड़ चुके हैं.
आग बढ़ रही है, रूह काँप रही है,
कंठ सुख रहे हैं, तन-मन तरप रहा है.
हिन्दू-मुस्लिम, जाट-पात, सब मिट चूका है,
हर तरफ से, छोटे-बड़े सबकी निगाहें टिक चुकी है.
वो निकली हैं आँखों में सुरमा लगा के,
अमीर-गरीब, गावं- जवार, पंडित-मौलवी,
सब इस बाढ़ में डूब चुके हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

योवन


लहरो को बाँध ले, ऐसा कोई किनारा देखा ही नहीं,
सागर की बात मत कर, उसकी नदियों में वो योवन ही नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

गहराई


बहुत जलील हुआ हूँ पर अब भी मज़ा आता है.
हुस्न ही उनका ऐसा है, देखने के बाद नशा आता है.
मत पूछ क्या पाता हूँ बिना बाँहों में गए उनके,
लहरों में उतर के कौन सागर की गहराई नाप के आता है.

परमीत सिंह धुरंधर

चाँद


शोर सुन के शहर वाले निकले,
भोर में फरियाद वाले निकले।
बिछा कर निगाहें बैठा हूँ हर गली-चौराहे पे,
जाने कब किधर से मेरा चाँद निकले।

परमीत सिंह धुरंधर

ज़माना


फूलों सा सुन्दर बदन और आँखों में शराब है,
फिर जाने क्यों कहते हैं सभी ज़माना ख़राब है.

परमीत सिंह धुरंधर

हाले-करम


अब खुदा भी नहीं पूछता मेरा हाले-करम,
अकेला रह गया हूँ उठा के तेरा जुदाई का गम.
मोहब्बत कभी भी इतनी शिद्दत से मत कर,
की उनका बिछुरना बन जाए जिंदगी का आखरी सितम.

परमीत सिंह धुरंधर