काला तिल


इतना खूबसूरत जिस्म,
पे ये काला तिल.
खुद ने लगा के तुम्हे उतरा है,
सबका दिल चुराने के लिए.
हम कहाँ तक खुद को बचाएं,
ये सितम तो है सबके उठाने के लिए.
तू मोहब्बत दे, या ठुकरा दे,
ये है तेरी मर्जी.
हम तो आते रहेंगे तेरे दर पे,
ये फ़रियाद सुननाने के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

काबिल नहीं है


वो बैठी हैं अपने कमरे में,
एक तस्वीर को सीने से लगाये.
की कल तक जिस दिल में हम बसते थे,
उस दिल में किसी और को छिपाए.
हमने पूछा की हुजूर,
क्या रखा है सीने में छुपा के.
वो मुस्कराये, खूब मुस्कराये,
राज को सीने में गहरा दबा के.
फिर हौले से बोले आँचल को संभाल के,
कुछ राज सीने में ही अच्छे है,
वो होठों के काबिल नहीं हैं.
अपनी मोहब्बत का वास्ता दे कर,
जब हमने मिलना चाहा।
बड़े प्यार से मेरे महबूब ने,
संदेसा भिजवाया.
मेरे बाबुल का समाज में रुतबा है,
ये मोहब्बत अब उसके काबिल नहीं है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


भिगों के धरा को आंसुओं से,
कब मोहब्बत मिला है किसे।
सींच दो किसी बंजर को इतना,
की कहीं तो कोई फसल उगे.
भाग कर उसके पीछे,
कौन पा सका है उसको।
हल ही चला दो किसी बंजर पे इतना,
की कहीं तो धरती से भूख मिटे।

परमीत सिंह धुरंधर

बेवफाई


खिदमत माता – पिता की,
कभी बेकार नहीं जाती।
किस्मत यार की कभी,
किसी के काम नहीं आती।
गुलशन में लाखों फूल खिले हैं,
पर भौरों के प्यास नहीं जाती।
हज़ारो तारे हैं आसमान पे,
एक चाँद के बिना,
अमावस्या की अन्धकार नहीं जाती।
और क्या लिखूं उनकी बेवफाई पे,
कम्बखत,
मेरी साँसों से उनकी महक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर

बेवफाई


उनकी बेवफाई का गम तो बहुत है,
पर जिंदगी में दर्द भी तो बहुत है.
रोज सोचता हूँ,
आज सारे दुश्मनों को मिटा दूँ,
पर कमबख्त,
इस दिल में मोहब्बत भी तो बहुत है.
कैसे रखूं तलवार उनके गर्दन पे,
उनकी आँखों में आंसू भी तो बहुत है.

परमीत सिंह धुरंधर

अगस्त 22


प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
शब्द मत समझना इन्हे कलम के,
मैंने साक्षात इसमें अपना ह्रदय रखा है.
तुम्हारी कमर पे हरपल झूलती,
वो चोटी मेरे ह्रदय की वीणा हैं.
जिसे मैंने तुमसे दूर इस शहर में,
अब तक हर एक पल में झंकृत रखा है.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
हर सुबह,
तुम्हारी केसुओं से जो छनती थी बुँदे,
मैंने उसे, विरहा के इस तपते रेगिस्तान में भी,
अपनी पलकों में संजोये रखा हैं.
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.
सब कुछ निपटा के, हर दीपक बुझा के,
जब तुम कमरे में आती थी एक दिया जला के,
मैंने आज तक, जीवन के हर निराशा में,
असफलता में, उसकी लौ को अपने सीने में,
प्रज्जवलित रखा है।
प्रेम में ये पहला पत्र लिखा है,
प्रिये तुम्हे मैंने अपना प्राण लिखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खता


पलकों से उनके, मैं मोहब्बत कर बैठा,
ये ही तो खता हुई, उनकी चाहत कर बैठा।
अब होठों से सुरु होती है हर कहानी,
मैं लल्लू, आँखों में उनके डूब बैठा।

परमीत सिंह धुरंधर

नया दौर


ये दुश्मनी का नया दौर है,
मोहब्बत में इलज़ाम लगाना,
अब शौक है.
कल तक रोती थीं जो मेरी,
पहलु में आने को.
आज मेरी पहलु से जाने,
को बेताब हैं.
एक रात के लिए जो,
अब्बा-अम्मा से लड़ गयी.
एक रात भी अब नहीं गुज़ारेंगी,
ये कह के मुख मोड़ गयीं.
ये वक्त का नया दौर है,
हर रात एक नया शौक है.
बहती गंगा में कौन नहीं हाथ धोता,
आज हुश्न से बड़ा गंगा कौन है.
ये अंदाजे-रुख का नया दौर है,
सबको फ्रेंडशिप का शौक है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हया


वो आज भी,
निगाहों में हया रखती हैं,
बस मोहब्बत में ही बेहया हैं.
तरप उठती हैं,
गोरैया के जख्म देख कर,
बस आशिक़क़ों की,
मौत की दुआ रखती हैं.
न जाने क्यों पूजते हैं,
दुनिया वाले देवी कहकर,
वो जो सीने में अब भी,
वासना और फरेब रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

खूबसूरत ह्रदय


खूबसूरत है जो ह्रदय,
वो सजता-सवरता ही नही.
सजने-सवरने वालों में,
कोई ह्रदय ही नहीं.
मैं कल भी चूड़ी लाया था,
मैं आज भी कंगन लाया हूँ.
आइना भी इंतज़ार में बैठा है,
चूल्हा है की भुझता ही नहीं.
सुबह थक कर चली गयी,
रात ऊब कर ढल गयी.
गजरा भी अब सुख गया,
बेलन-चौकी उनकी थकती ही नही.

परमीत सिंह धुरंधर