मोहब्बत


सुबह में देखि सीरत,
शाम को देखि सूरत.
बदले- बदले से,
दोनों लगे.
तब जाके समझी
कीमत.
सुख-दुःख में साथ देने का,
मीठा बोल बोलके.
जब जेब हुई खली,
सेज ही वो बेच गए.
अमीरी में देखि सोहरत,
गरीबी में देखि जिल्लत,
बदले – बदले से,
दोनों लगे.
तब समझी,
उनकी मोहब्बत.

परमीत सिंह धुरंधर

उन्हें बेवफा मत कहो


उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
सीरत से न सही, सूरत से तो हो गयी.
बाढ़ में डूब जाते हैं कितने ही किनारें,
क्या हुआ?
जो कुछ वो भी डूबा गयीं.
दिल से न सही, जिस्म से तो हो गयीं.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.
कैसे काटे कोई जीवन, किसी एक के साथ,
इसलिए,
किसी को निगाहें, किसी को अपने होठ दे गयी.
उन्हें बेवफा मत कहो,
शुक्र है की वो किसी की तो हो गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

कालेज में एक नया चेहरा


कालेज में एक नया चेहरा,
मजनुओं के महफिल में,
जोश जगा गया.
जो मिट गए मोहब्बत में,
वो किसी काम के नहीं.
पर इन बचे हुए, दबे, हारे,
कुचलों के मन में,
इंकलाब जगा गया.
कुछ खास नहीं,
बस एक दुप्पट्टे में हैं,
इस उजड़ी हुई बस्ती में,
एक चाँद सी हैं.
की एक,
चलना ही देख कर उनकी,
बहक रहे हैं यहाँ सभी,
एक झलक उनकी,
कब्र में जाने से पहले,
जन्नत दिखा गया.
अब साजिस रची जाएंगी,
किस्से गढ़े जाएंगे,
जीते-जश्न, गमे-हार,
के दौर भी आएंगे।
मगर, उदास चेहरों,
बुझती जवानी,
इन अँधेरी रातों में,
कोई फिर से आज,
सुनहरे भविष्य और,
मीठे ख़्वाबों का,
एक दिया जला गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बढ़ा चल-बढ़ा चल


दर्द ही अगर जिंदगी है तो मोहब्बत खुले आम कर,
शौक ही अगर तेरा यह ही है तो बेवफाई का न गम कर.
हौसले अगर पस्त ना हुए हो तेरे तो बढ़ा चल, बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.
खूबसूरत चेहरे चाँद से और आँचल उनका बादल सा,
बरस गए तो किस्मत तेरी वरना नए मानसून का इंतज़ार कर.
शहीद हुए कितने इन राहों में कौन आंसू बहता है,
मौत से जो निर्भय है वो ही हुस्न से दिल लगता है.
बेवफाओं की इस बस्ती में कितने उजड़ गए,
किस -किस का जिक्र करें और कहाँ -कहाँ करें।
तू अपनी सोच, मंजिल पे नज़र रख, बढ़ा चल-बढ़ा चल,
वो किसी और की डगर तू एक नयी थाम कर.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


तेरी मोहब्बत में क्या लिखे,
हो भी लिखता हूँ मिट जाता है.
मैं तो खुद डूबा हुआ हूँ,
दूसरों को यहाँ क्या बचाएं।

परमीत सिंह धुरंधर

जोबन


तेरी दो पलकें सागर सी, नए-नए मयखाने हैं,
उमरिया सारी तुझको दे दूँ, पढ़ते रह फिर पाठशाले में.
मत पूछ राही मन से मेरे जोबन में रस है कितना,
दिल को तेरे सींच दूँ, ठहर दो पल, पथ है लम्बा।
फूल – पाती रख ले सब अपने झोले में भर के,
मेरे अंगों पे तो सोना, पीतल सब है पिघला।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.
आज भी जब गुजरता हूँ उनकी गलियों से,
तो भर जाती हैं मेरी झोलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुम्हें दर्जनो की मोहब्बत मिले,
मैं यूँ ही प्यासा भटकता रहूँ।
तुम्हें चाँद-तारों की रोसनी मिले,
मैं यूँ ही अंधेरों में जाता रहूँ।
मेरी मोहब्बत ही सच्ची थी,
पर मैं सोना-चांदी नहीं ला सका।
तुम्हें सोहरत मिले, तुम्हें दौलत मिले,
मैं यूँ ही फकीरी में तेरी चित्र बनता रहूँ।
तमन्ना थी की आँखों का काजल बनूँ,
जुल्फों का गजरा, होठों की लाली बनूँ।
तेरा सौंदर्य सदा सबकी प्यास जगाता रहे,
मैं यूँ ही आँसुंओं से प्यास मिटाता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

दिल के कच्चे


मत पूछो,
मेरी जवानी के किस्से,
मोहल्ले के सारे अपने,
ही बच्चे हैं।
क्या हुआ,
जो कहते हैं,
हमें वो चाचा.
कमबख्त,
खून के ये रिश्ते,
ऐसे ही,
अच्छे हैं.
महफूज है मेरी बाहों में,
आकर ये.
ये इनकी माँ भी जानती हैं,
की हम आज भी,
दिल के कच्चे हैं.
दर्द तब होता है,
जब वो कहती हैं, मियां,
और तुरंत कहती हैं,
अलबिदा।
मुस्काती हैं ये सोचकर,
की हम आज भी उनके,
धागे से बंधें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर