उनके नज़र से नज़ाकत ऐसे खो गयी,
रूह मेरी थी वो क़यामत ढा गयी.
रुख ऐसे मोड़ा की क्या बताऊँ,
दिन में ही मुझे चाँद-तारे दिखा गयी.
मोहब्बत की अब नहीं है कोई तमन्ना,
वो एक रात ऐसे अपने होठों से पीला गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
उनके नज़र से नज़ाकत ऐसे खो गयी,
रूह मेरी थी वो क़यामत ढा गयी.
रुख ऐसे मोड़ा की क्या बताऊँ,
दिन में ही मुझे चाँद-तारे दिखा गयी.
मोहब्बत की अब नहीं है कोई तमन्ना,
वो एक रात ऐसे अपने होठों से पीला गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
ए कलम,
क्या लिखूं,
उनकी खूबसूरती पे.
जब भी मिलीं,
सारे दिए बुझ गए.
चाँद भी निकलता है,
तो तारो को साथ ले के.
वो तो एक सूरज थीं,
जब भी निकलीं,
सारे सितारे डूब गए.
परमीत सिंह धुरंधर
ये मत पूछ की वो कितने रात मेरे पास थीं,
ये पूछ की जब वो साथ थीं तो कैसी रात थी.
न खुद सोयी न मुझे सोने दिया,
सारी रात वो चुप थीं, और मैं भी खामोश था.
दिन – भर जो पहनती थी इठला -इठला कर,
रातों को मैंने, सोना-पीतल सब झाड़ लिया.
ये मत पूछ की मैंने कितने रात लूटें सोना-चांदी,
ये पूछ की मैंने क्या -क्या नहीं लुटा.
परमीत सिंह धुरंधर
फ़क़ीर मत समझो तकदीर मेरी देख के,
जवानी थी अपनी, अमीरी लूटा गए.
ऐसे -ऐसे शौक पाले थे, वो मांगती गयी,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे मिलने के पहले, खुद से मोहब्बत थी,
उनसे मिलने के बाद, खुद से नफरत होती है.
पहले हम दिन-रात सोते ही रहते थे,
अब नींदें उनकी, तन्हाई अपनी है.
की कहाँ रखे सीने में उनकी यादो को संभाल के,
अब हर तरफ, चारो और पानी ही पानी है.
बस पानी ही पानी है.
परमीत सिंह धुरंधर
टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.
परमीत सिंह धुरंधर
ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
छोटे- छोटे मेरे बच्चे,
देख तुझी को अम्मा बोलें।
इनके मुख को ही देख के,
अब चूल्हा जला तू मेरा।
ए गुलाबो, वो गुलाबो,
सुन गुलाबो तू जरा,
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
बोलेगी तो नथुनी दिला दूँ,
ना तो बोलेगी तो हँसुली।
जो आये मन में, वो करना,
करूँगा ना, टोका – टोकी,
बस साँझ -सबेरे आके कर दे,
चूल्हा -चौकी तू मेरा।
मेरी छमिया, मुझको छोड़ चली,
अब घर सम्भाल तू मेरा।
परमीत सिंह धुरंधर
बाग़ में गयी थी कल सखी मैं फूल तोड़ने,
कोई पावों को चुम गया मेरे शूल बनके।
छत पे गयी थी कल सखी मैं गेहूं छांटने,
आँखों में बस गया कोई मेरे धूल बनके।
पनघट पे गयी थी कल सखी मैं पानी भरने,
जोवन को चख गया कोई मेरे जल बनके।
कैसे कहूँ घर में ये सारी बातें, की
ह्रदय में रहने लगा है कोई मेरे मीत बनके।
परमीत सिंह धुरंधर
तुझको प्यार ही नहीं,
मैं संसार कहता हूँ,
तू मेरी चाहत है,
ये खुले आम कहता हूँ.
ये जान कर भी,
की तू मेरी नहीं है,
तेरे तिब्बत पे मैं,
अपना अधिकार कहता हूँ.
माना की कभी तू बाहों,
में नहीं आएगी मेरे,
पर मैं आज भी तेरे,
क्रीमिया पे निगाहें रखता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर