इश्क़ इस कदर नाकामियों में पल रहा है,
की मैं मौत से मोहब्बत मांग रहा हूँ.
वो भी खेलने लगी है अब आँख-मिचौली,
जिससे मैं अपना दिल लगा रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ इस कदर नाकामियों में पल रहा है,
की मैं मौत से मोहब्बत मांग रहा हूँ.
वो भी खेलने लगी है अब आँख-मिचौली,
जिससे मैं अपना दिल लगा रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
एक होली मैंने खेली,
मेरी पिचकारी थी,
और थी उनकी चोली।
भींगती थी वो,
मुस्करा-मुस्कारा कर,
जब-जब हमने,
रंग थी उनपे डाली।
परमीत सिंह ‘धुरंधर’
मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।
परमीत सिंह परवाज
सुग्गा पकरले बानी एगो बगइचा में,
आ व अ न सखी, तोहके दिखाईं,
बोलेला मिठू कइसन हमरा कहला में.
एके नजर डालनी त अ भूल गइल,
पंख पसारल, की छोड़ के अब आपन,
घर- द्वार बइठल बा हमरा आसरा में.
आवअ न सखी, तोहके दिखाईं, बोलेला
मिठू धुरंधर कइसन हमरा कहला में.
देख अ जवानी के लिल्ला,
एगो मुस्की पे,
हिलअइले बारी जिल्ला।
चलावअ तारी हसुआ घांस पर,
लेकिन,
चिरअ तारी हमार सीना।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
बैला मारखाव भी आके,
इन्कारा आगे,
हो जाला एकदम सीधा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
अंखिया में कजरा डाल के,
चुनर के अपना छान के,
लीलअ तारी बीघा – पे – बीघा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी,
धुरंधर सिंह के जिल्ला।
जब से जवान भइल बारु,
नयका तू धान भइल बारु।
चमकअ तारु, उछलअ तारु,
चवरा से लेके खलिहान तक.
लूटअ तारु, धुनअ तारु,
गेंहूँ से लेके कपाश तक.
सारा जवार ई दहकता तहरे,
जोवन के ई लहक से.
बुढऊ के मन भी बहकता,
तहरे आँचल के उफान पे.
खेलअ तारु, खेळावअ तारु,
आँचरा में सबके बाँध के.
रगरअ तारु, झगड़अ तारु,
चढ़ के सबके दूकान पे.
जब से जवान भइल बारु,
धुरंधर सिंह के धान भइल बारु।
मैं हौले-हौले दिलवर, तुम्हारे पास आऊंगा,
कभी मैं मोहब्बत करूँगा, कभी सताऊंगा तुमको।
आईने की जरुरत ही क्या हैं, मेरी आँखे है तुमपे,
कभी मैं शिकायत करूँगा, कभी सजाऊंगा धुरंधर सा तुमको।
हुस्न ने आज हमें आँखों से नहीं, ओठों से नहीं, शब्दों से पिलाया है,
जब उसने धुरंधर सिंह को “मनीष मल्होत्रा” कह कर बुलाया है.
मिलता नहीं है कोई इस बाजरे-किस्मत में मंजिल तक साथ देने को,
मगर राहे-सफर में किसी ने आज हमें क्या जामे-मोहब्बत पिलाया है.
दिल तोड़ के मेरा तुम मुस्कराने लगे,
मोहब्बत क्या है ये बताने लगे.
आँखों से जो दुनिया दिखाई थी मुझे,
ओठों तक आते-आते जुठ्लाने लगे.