निरीह, सुसुप्त, वक्ष


मिल जाती है सबको ही सोहरत,
बाजार में.
ये सोहबत है, जो मिलती है,
बस पाठशालाओं और मयखानों की,
बंद दीवार में.
उनका आँचल है जो,
चुपके से सरक जाता है,
हर एक रात.
वक्षों को छोड़कर,
अकेला, निहत्था,
मझधार में.
ये तो सोहबत है, लबों की,
जो अपनी प्यास मिटाने को,
कर देता है आगे,
निरीह, सुसुप्त, वक्षों को,
भीषण संग्राम में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

निकाह होने के बाद


मेरी मोहब्बत में,
उन्होंने एक खुसनुमा गुनाह,
कर दिया।
दिल मेरे नाम,
और जिस्म किसी और,
को कर दिया।
निकाह होने के बाद भी,
उनके नैनों के जाम मेरे हैं.
उन्होंने अपनी हया मेरे,
और बेहयाई किसी और के,
नाम कर दिया।
मत पूछ,
हुस्न से इस भेद का राज.
यही तो है, जिसने
जिस्म और दिल के आग,
को अलग – अलग कर दिया।
अब भी शिकायतें करते हो,
तुम हुस्न से.
अरे तुम्हारा पौरष क्या है?
इनके आगे.
इन्होंने अपने दो बाहों से ही,
कितनों के आँगन को,
गुलजार कर दिया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


टूट कर भी समंदर,
बिखरता नहीं।
ये दरिया है,
जिसकी किस्मत में ठहरना नहीं।
इश्क़ हमने भी किया है,
हुस्न के मिजाज में कहीं कोई वफ़ा नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


वफाये – मोहब्बत, हुस्न के आँचल में तो ना देख,
इनके अंगों पे ठहरता इनका आँचल भी तो नहीं।
दरिया की मिठास वही मुसाफिर याद रखते हैं,
जिनका घर कभी किनारों पे बसा ही नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत में अपने ये रोजे


किस्से तो कई हैं,
बंद दीवारों के अंदर।
हौसलें नहीं है,
की कोई उनको खुले आसमान के तले पढ़े.
मेरी मोहब्बत कुछ इस कदर हैं उनसे,
की पलके बिछा दी,
उन्होंने जहाँ – जहाँ अपने कदम रखे.
जा चुन ले किसी को भी जमाने में,
मुझे छोड़कर।
हम फिर भी रखेंगे,
तेरी मोहब्बत में अपने ये रोजे।

 

 

 

परमीत सिंह धुरंधर

Spark


The color is dark,
But she has the spark,
That I need.
Who cares about the skin?
If she could touch my heart.

 

Parmit Singh Dhurandhar

निहारती ही रही आईने को उम्र भर


तुम कभी समझ ही नहीं सके हमारे रिश्ते को दिल से,
तुम चाहे जितना भी पढ़ लो किताबें अपने जीवन में.
मुझे ये गम नहीं की हम एक साथ न रह सके,
तुमने कभी चाहा ही नहीं की हम साथ रहें खुशियां बाँट के.
तुम निहारती ही रही आईने को उम्र भर,
कभी खवाब संजोया ही नहीं आँखों को मूंद के.
लाखों हैं यहाँ तुम्हारे जोबन के गिरफ्त में,
मगर तुम अब भी नहीं हो किसी एक के भी वफाये – जहन में.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बक्षों पे उठाया नहीं जाता


हुजूर, आपसे अब यहाँ उम्र का गुजर नहीं होता,
कुछ मिले हमें भी अब की यूँ तन्हा इसारा नहीं होता।
ढलें हैं चेहरे ही बस, मंसूबें अब भी जवानी की मौजों में हैं,
यूँ घूँघट में अब सब कुछ मुझसे बांधा नहीं जाता।
कब तक आईना दिखलाये मुझे भंवर मेरी योवन का,
अब आँचल का भार यूँ बक्षों पे उठाया नहीं जाता।

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न


जिन्दगी में सुख का और अँधेरे में हुस्न का जवाब नहीं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खत्री और Crassa


कैसे सहोगी पतली कमर पे रानी,
इतना भार बरसात में.
मेरी बाहों का सहारा ले लो,
नहीं तो खत्री ले जाएगा मझधार में.
मैं तो हूँ दिल का बड़ा भोला – भाला,
धीरे-धीरे करूँगा तुम्हे प्यार।
खत्री तो हैं शातिर – शैतान,
चूस लेगा सारा रस, एक ही बार में.
कैसे संभालोगी अकेले रानी,
ये खनकती जवानी इस संसार में.
मेरे साथ घर बसा लो,
नहीं तो खत्री लूट लेगा ये श्रृंगार रे.
मैं तो हूँ दिल से बड़ा सीधा -सच्चा,
उठाऊंगा नखरे तुम्हारे जीवन भर.
खत्री तो है खिलाड़ी – रंगबाज,
अंग – अंग निचोड़ लेगा, एक ही बार में.

 

परमीत सिंह धुरंधर