हुस्न


हर फैसला लेती हैं,
लड़कियां,
सूरत और जेब का भार,
देख कर.
और कहती हैं की,
वो दिल ढूंढ रही हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

किन दीवारों पे लिखूं तेरा नाम?


किन दीवारों पे लिखूं तेरा नाम?
मुझे नहीं पता.
हर दीवार,
अब दुश्मन की सरहद में है.
इश्क़ इस कदर मुझे तन्हा कर देगा,
नहीं जाना था.
क्यों की मेरी हर साँस,
अब उनके गिरफ्त में हैं.
मेरी आँखे, रोशनी नहीं,
तेरा दीदार चाहती हैं.
इन्हें अब तक ये नहीं पता,
की तेरा जिस्म अब गैरों की बाहों में हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मज़बूरी


यूँ ही दिल है की संभालता नहीं हैं,
और वो हैं की सीना खुला रखती हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

नागिन का ताप ना मिटा


सदियाँ गुजर गयीं,
वो दर्द ना मिटा।
ओठों का तेरे अब तक,
वो रंग ना मिटा।
मेरे खवाबों में आते हैं,
अब भी वो तारें।
जिनके चाँद का,
वो दाग ना मिटा।
कैसे संभाले कोई जीवन को?
नागिन का विष उतर भी जाए तो.
हाय, तन से अभी तक,
उस दंश का ताप ना मिटा,
रे ताप ना मिटा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

The girl at the Boston airport


The girl at the Boston airport,
Sweet, small
And like a doll.
The color of the eyes,
And her face changed,
When she saw so many books,
In a single bag.
Something happened,
Inside her heart.
She forgot all her knowledge,
And,
Started looking for her boss.
She thought the hard drive,
As a battery.
And tried hard to pull,
The bag on the trolley.
I told, “excuse me miss, it is very heavy”.
In the last,
With the red face,
She gave a special smile.
And her eyes wished me “happy journey”.

 

Parmit Singh Dhurandhar

खूबसूरती


खूबसूरती तुममे इतनी है की,
चिरगों में रौशनी की कमी है.
गुरुर मुझमे इतना है की,
दुश्मनो की संख्या बढ़ती जा रही है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फकीर शहंशाहे-हिन्द


तुम्हारी लबों से होकर गुजरा जो पल,
फीका लगने लगा ये ताजो – ये तख़्त।
एक पल में सब गुरुर बिखरने लगा,
कितना बड़ा फकीर है ये शहंशाहे-हिन्द।
परमीत सिंह धुरंधर

ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो


माई कहले बारी,
तहसे हम बात ना करीं,
की तू बड़ा बदनाम बड़ा हो.
हमार माई कहले बारी,
तहके घर ले चलीं,
की ताहार नाक बाटे सुन्दर बड़ा हो.
चलअ, हटअ पीछे, हमके मत छेडअ हमके,
बाबुल से पहले मांगअ ई हाथ हो.
देखअ ताहरा खातिर कंगन ले आइल बानी,
पाहिले पहनाएम ई ताहरा हाथ हो.
देखअ हाथे तक रहअ, पहुँचा मत धरअ,
हमार धड़कअता अब दिल हो.
त छोड़अ माई – बाबुल के चिंता,
अब हो जाएगअ सार खेल हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

मायके में चढ़ती जवानी अच्छी नहीं


तेरी आँखे मुझसे कह रही है,
यूँ साँसों की दूरी अब अच्छी नहीं।
तो छोड़ दे ये शर्म ए गोरी,
तेरी कोरी जवानी अब अच्छी नहीं।
कब तक संभालेंगे बाबुल तुझको,
ढलकने लगा है तेरा आँचल।
यूँ मायके में चढ़ती जवानी अच्छी नहीं।
अंगों में तेरे इतना कसाव,
जैसे मन में छुपा हैं कोई डर.
यूँ डरती – खामोश जवानी अच्छी नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

 

किसी भी हुस्न में ऐसी विरह की आग नहीं


हम चाहें हुस्न वालों को,
मेरी ऐसी औकात नहीं।
सीधे -सादे इंसानों के लिए,
हुस्न के पास कोई सौगात नहीं।
इससे अच्छा की लगा दे जिंदगी,
अगर खुदा की राह में,
तो कोई बरक्कत हो जाए.
मक्कारी के अलावा,
हुस्न की झोली में कुछ भी नहीं।
कल रात मेरी कलम ने मुझसे कहा,
२५ दिन हो गए,
तुमने मुझे छुआ तक नहीं।
किसी के जिस्म को क्या छुऊँ?
किसी भी हुस्न में,
ऐसी विरह की आग नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

There is no desire left for you as my brain feels attraction for creativity and simplicity.