१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.
परमीत सिंह धुरंधर