सोलह साल


१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.

परमीत सिंह धुरंधर 

1957


बहुत सुने हैं,
हमने,
किस्से ५७ के,
संग्राम की.
ऐसे लड़े थे,
मेरे पुरखे,
की,
एक था रंग,
सुबह और शाम की.

परमीत सिंह धुरंधर 

धरती भारत की


जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ और भगत सिंह


तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।

परमीत सिंह धुरंधर 

भारत


विश्व भारती,
ये है धरती,
राम-रहीम जहाँ,
एक साथ खेले.
लहराने को तिरंगा,
वीर यहाँ,
हँसते-हँसते,
झूल गए.
देखो इस हिमालय को,
हमने जिसका मान रखा,
अपने लहू से रंग दिया,
जब-जब इसका शान घटा.
विश्व भारती,
ये है धरती,
जहाँ बड़े- बड़े संग्राम हुए.
और यहीं पे,
बुध-महावीर ने,
शान्ति के पाठ पढ़ें.

परमीत सिंह धुरंधर