निर्मोही-बिद्रोही, मैं बिहारी हूँ


निर्मोही-बिद्रोही, मैं बिहारी हूँ
मेरे नस-नस में है रस विरह का।
छपरा का बाबूसाहेब, मैं
मदमस्त-अलमस्त खिलाड़ी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

माटी के गीत गाता-सुनाता,
भोर में गाता, संझा में गाता,
हर ठेहुनी पे जग का गाता,
मैं भटकता-बंजारा-स्वाभिमानी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

पनघट पे बैठा प्यासा पुजारी,
घड़ा भरे बिना भी आनंदित भारी,
मिट्टी में मीत, नदी में नारी,
मैं तन्मय-तपस्वी संसारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

लिट्टी की आँच में जो तपता,
आम्र-छाँव में जब भी रमता,
सावन में झूमे, भादो में गाता,
मैं लोक की कविता का अधिकारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

नागार्जुन की हँसी में रहता,
दिनकर के सूरज-सा जलता,
फूलों में, काँटों में पलता,
मैं मिट्टी की भाषा का उजियारी हूँ।
मेरे नस-नस में है रस विरह का।

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मैं बस बिहार देखता हूँ


गर्व की हर रात को, ओस में भिंगो के
ऊषा की किरणों में चमकता देखता हूँ।
मैं सोते-जागते, बस बिहार देखता हूँ।
प्रचंड धूप में, पसीने से लथपथ
मैं बहते अपने हल, और लहलहाते धान देखता हूँ।
मैं चलते-बैठते, बस बिहार देखता हूँ।

मैं कितना भी चाह लूँ तुझे ए मिट्टी,
तुझे पाने की प्यास कम होती नहीं।
परदेश की गलियों में जब भी थकता हूँ,
रसोईं में लिट्टी की खुशबू, खिचड़ी-अचार देखता हूँ.
मैं खाते-सूंघते, बस बिहार देखता हूँ।

अधरों पे छपरा तो नयनों में सीवान देखता हूँ।
मैं गाते-झूमते, बस बिहार देखता हूँ।
तुम भी देखो, जहाँ से तुम आए हो,
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
अपनी कलम से संपूर्ण ब्रह्मांड देखता हूँ।

जहाँ पग-पग पे कथा है पुरखों की,
मैं खेतों की हर मेड़ पे इतिहास देखता हूँ।
बचपन की गलियों में गूंजती किलकारी,
हर कोने में माँ का आँचल देखता हूँ।
मैं चलते-लिखते, बस बिहार देखता हूँ।

छठ की अरघ्य में उगते सूरज को,
मैं प्रवासी आँखों से नमन देखता हूँ।
करवों की भीड़ में जब “बोल बम” सुनता हूँ,
हर तरफ में गंगा का बहाव देखता हूँ।
मैं यादों में भी, बस बिहार देखता हूँ।

पटना की शामों में उम्मीदों की लौ,
गंगा की धार में समय को बहता देखता हूँ।
भोजपुर की तलवार, मिथिला का श्रृंगार,
हर दिशा में एक तेजस्वी चेहरा देखता हूँ।
मैं जागते-सपने, बस बिहार देखता हूँ।

तुम भी लौटो, इस धरती के रंग में,
जहाँ मिट्टी में सोना उगता है हर बार।
दिनकर-नागार्जुन की माटी से मैं
कविता नहीं, एक जीवंत संसार देखता हूँ।
मैं जीते-मरते, बस बिहार देखता हूँ।

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बिहार मेरा, अनमोल बड़ा


बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.
तेरी गोद में मैं खेला
वही रंग मेरा तुझपे गया.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं पिता की ऊँगली पकड़ कर मैं चला
वहां दौड़ा और फिर बड़ा हुआ.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं तूने झुलाया झूलों पे
वहीं लोरी तुम्हारी सुनकर मैं सोया।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ।

वहीं नाम मिला, वहीं प्यार मिला
वहीं सरसों का तेल देह पे चढ़ा.
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

वहीं आम के बाग़,
वहीं मछली के तालाब।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

कितना भी मैं कमा लूँ ताज
कितना भी मैं बना लूँ ताज
फिर भी वो सुकून नहीं
की मिट्टी में वह जो फूल खिला।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ.

रिश्ता ना फिर ऐसा मिला
दिल ना कहीं फिर ये जुड़ा।
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
बिहार मेरा, अनमोल बड़ा
की वहां की हवा में तू है मेरी माँ

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बिहार-दिवस


नजर ही नहीं आई, कब वो बेवफा हो गई
मोहब्बत भी तब हुई, जा वो पराई हो गई
ए मिट्टी तू कहीं, मैं कहीं, तेरी खुसबू,
मेरी शहनाई तो नहीं, मेरी तन्हाई हो गयी.

On Bihar Diwas, March 22, 2025.

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पहला प्यार बिहार जैसा


पहला प्यार कैसा होता है
बिहार जैसा।
उजाड़ हो गया जहाँ मेरा पर वही मेरा नशा है
कोई और उजाड़े उसे तो फिर दर्द होता है.
जाने कैसे बाँट लेते हैं लोग माकन और देश को
मैं पूर्वांचल का हूँ, पर वो मिथिलांचल मांगते हैं
तो दर्द होता है.
यूँ ही नहीं कहते हमें, बाबूसाहेब छपरा के
हमारे सीने में बिहार बसता हैं.

तेरी चुनर को मैं सजा न सका
ये तेरी विवशता, तेरी गरीबी नहीं है
ये मेरी नाकामी, मेरी वेवफाई हैं.
फटी, मैली -कुचैली कपड़ों में तू
आज भी मीठी सी शहनाई है.
हस ले ये दुनिया चाहे जितना भी
की ढल गयी तेरी जवानी, और
अब झुर्रिया हैं चेहरे पे
पर मैंने जी और देखि तेरी अंगराई है.

तेरी लचकती कमर पे बिहार मेरा
उलझती नज़र पे छपरा बसा
वादियाँ राजगीर की, वो वक्ष तेरे
विचरता है मन, हर प्रातः जहां।

तेरी जुल्फें सघन, उफनती नदी
अधर तेरे, कोई सोइ नागिन
पटना की प्यारी कचौड़ी गली
तेरी वो नाभि गहरी
भटकता है दिल, हर शाम जहां।

तेरी चाल, सोनपुर का वो मेला
जिससे जलता था लाखों का चूल्हा
वो कटाव, वो कसाव तेरा, गंगा का किनारा
लगती थी नाव मेरी, हर रात जहां।

ना मिली नौकरी, तू छोड़ गयी
जैसे पैसे के लिए छूटा गावं मेरा।
तेरी बाहें मेरा खलिहान
अब कोई और सो रहा है जहां।
तेरी यादें, तेरा चेहरा, बनारस
दिल का चैन, लुटा है जहां।

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बाँटने नहीं देंगे अपना बिहार


वीरों की धरती पे हैं फिर से लड़ाई सांप से
सत्ता हमको बाँट रही है जात -पात के नाम पे.
हम लाये हैं आज़ादी जिसपे हुए लोगों कुर्बान रे
पर रोज-रोज माला डालते बस जवाहर लाल पे.
लड़े वीर कुंवर सिंह, और भगवान् विरसा साथ में
फिर भी दोनों आज अलग-अलग हैं सत्ता के दावं से.
पहले बांटा अपने लालच में हमें बिहार-झारखण्ड में
अब फिर से वो ही लोग मिथिलांचल हैं मांग ते.
मैं तो विरोध करूँगा इसका, दोस्तों तुम भी आवो साथ में
बाँटने नहीं देंगे अपना बिहार, इस बार सत्ता की चाह में.

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हरियर घास रजऊ


अंगिया के कइलह अंगार रजऊ
छोड़ के आपन सुनर बिहार रजऊ.
का होइ ई दौलतात – शोहरत
जब देखलह ना हमर श्रृंगार रजऊ.

छोड़ के माटी, खेत, खलिहान,
भूल गइल आपण पहचान रजऊ.
दे गइलह अइसन विरहा के आग
अब के सुनी हमर मन के पुकार रजऊ.

तू ना सही कोई और चरी
चौंरा के ई हरियर घास रजऊ.
अंगिया के कइलह अंगार रजऊ
छोड़ के आपन सुनर बिहार रजऊ.

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चमकीली ये दुनिया मेरे बिहार सी नहीं


धुप ये शहर की मेरे गावँ सी नहीं
कमर तेरी पतली मेरे यार सी नहीं।
ढूंढता हूँ जिसको वो सितारों में नहीं
चमकीली ये दुनिया मेरे बिहार सी नहीं।

जहाँ हम ही हम थे और थे बाग़ मेरे
मोहब्बत की वो जमीन यहाँ तो नहीं।
तुम कहते हो हम भुला दें वो बातें
हम कहतें हैं, वो दिल हैं कोई याद तो नहीं।

ये रंग बाजारों का, उन गुब्बारों सा नहीं
जिसे फोड़ते भी हम थे और फुलाते थे हमीं।
मीठी है तो, मुबारक तुम्हे ये दुनिया
इन सपनों में मेरा वो गावं तो नहीं।

कदम जो ये उठे थे जिस मुकाम के लिए
उस मुकाम पे मेरा वो मकान तो नहीं।
चूल्हे की चाय से काट जाती थी सर्दी
वो गैंठी सुलगाती मेरी माँ तो नहीं।

दिल चाहे वो गलियाँ जिसपे पेड़ हों
छावं में जिसके बैठते सब एक हो.
ऐसी होगी जिंदगी, मैंने सोंची तो नहीं।
ये शोर, ये धुंध मुझे रास आती नहीं।

यहाँ चेहरों के पीछे कहानियां कई
वहाँ चौखट के पीछे भाभियाँ कई.
यहाँ पब-बार में मज़ा पनघट का तो नहीं
जो चला था वहाँ से वो यहाँ मिलता भी नहीं।

वो छोड़ा जिसे इस महफ़िल के लिए
ये महफ़िल हमें जानती भी नहीं।
वो माटी वो महुआ, इस मदिरा से थी नशीली
और वो नशा आज तक उतरा भी नहीं।

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जय छठी मैया


मन की कामना, मनोकामना
पूर्ण करो मैया, एहि गुहार है हाँ.
एहि गुहार है हाँ.
ऐसे ही आती रहो,
आशीर्वाद बरसाती रहो,
तुमसे मिलके लगता है जीवन सफल हाँ.
एहि पुकार है हाँ, एहि पुकार है हाँ.
जन-जन के मन का विश्वास हो मैया
जन-जन के आँखों की पुकार हो मैया
दर्शन पा कर मैया तेरी, हुए हैं धनवान हाँ.
तुम छोड़ोगी ना अपने भक्तों को मैया
एहि जन -जन का विश्वाश हैं हाँ.
एहि गुहार हैं हाँ, एहि गुहार हैं हाँ.
आदि काल से मानव के इस यात्रा में
तुम्ही साथ हो मैंया।
सबका कल्याण, सबका उद्धार करती ही रही हो
करती ही रहना मैया।
चरणों में तुम्हारे हर वर्ष शीश मैं नवाता रहूं
एहि गुहार हैं हां, एहि गुहार है मैया।
जय छठी मैया, जय छठी मैया।

सारी रात आज बिहार लिखूंगा


अपनी मोहब्बत का मैं दास्ताँ लिखूंगा
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तेरी कमर को छपरा, वक्षों को सिवान लिखूंगा
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तेरे अधरों को लिट्टी, गालों को चोखा
उसपे इन आँखों को आम का आचार लिखूंगा।
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।
तुम्हारें पावों को धुरौन्धा, बाहों को पटना,
ढोंढ़ी को अपना मलमलिया बाजार लिखूंगा।
तुम्हारे जिस्म पे सारी रात आज बिहार लिखूंगा।

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