कालेज में एक नया चेहरा


कालेज में एक नया चेहरा,
मजनुओं के महफिल में,
जोश जगा गया.
जो मिट गए मोहब्बत में,
वो किसी काम के नहीं.
पर इन बचे हुए, दबे, हारे,
कुचलों के मन में,
इंकलाब जगा गया.
कुछ खास नहीं,
बस एक दुप्पट्टे में हैं,
इस उजड़ी हुई बस्ती में,
एक चाँद सी हैं.
की एक,
चलना ही देख कर उनकी,
बहक रहे हैं यहाँ सभी,
एक झलक उनकी,
कब्र में जाने से पहले,
जन्नत दिखा गया.
अब साजिस रची जाएंगी,
किस्से गढ़े जाएंगे,
जीते-जश्न, गमे-हार,
के दौर भी आएंगे।
मगर, उदास चेहरों,
बुझती जवानी,
इन अँधेरी रातों में,
कोई फिर से आज,
सुनहरे भविष्य और,
मीठे ख़्वाबों का,
एक दिया जला गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर