ख़्वाब


जब से सीना तुम्हारा उभरने लगा है,
गावं से शहर तक मौसम बदलने लगा है.
दुप्पटे के रंग से ही घायल हो रहे है यहाँ कितने,
और कितने,
बाँहों में भींचने का ख़्वाब सजोने लगे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

तमन्ना


इन काली-काली आँखों में,
मैं काजल बनके बस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ चंदा-तारें ले आऊँ.
कभी बादल बनके बिचरूँ,
इन उड़ती-उड़ती तेरी जुल्फों में.
फिर कभी छम-छम करके बरसूँ,
तेरे उन्नत-उन्नत बक्षों पे.
तेरी गोरी-गोरी काया पे,
चन्दन सा मैं घिस जाऊँ।
कुछ प्यार-मोहब्बत की बातें,
कुछ हल्दी-उबटन लगाऊँ।

परमीत सिंह धुरंधर

मैं ख़्वाब देखता हूँ


मैं ख़्वाब देखता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे वृक्षों पे फल नहीं लगते,
फिर भी मैं उनको सींचता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
बागों में अपने मैं आम नहीं,
शीशम लगता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
मेरे तालाब की मछलियाँ,
किनारों पे तैरती हैं.
और मैं बीच पानी में,
बंसी डालता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.
हर शाम हारता हूँ,
युद्ध जीवन का.
पर नयी सुबह में,
नयी रणभेरी छेड़ता हूँ,
मैं ख़्वाब देखता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर