तेरे अंगों पे जो अंग मिले
पुष्पों में तब मकरंद बने
हुई चाहत परागों की
तब पाने को भौरें मचल उठे.
तेरे अंगों की मदिरा
अधरों पे मेरे अमृत बन जाए ।
ऋषि छोड़ के मोक्ष का मार्ग
तेरे नयनों के भवर में उपलायें।
चाँद की चाँदनी चुपके से,
उतर के तेरे आँचल में ठहर जाए।
सदियों की प्यास बुझाने को,
तेरे वक्ष जिया को ललचायें।
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