ऐसी चोट खाई है


मौसम सा हैं वो या मौसम भी उसका मासूक है
कमर पे बादल और केशुवों में हवा महफूज हैं.
रुत बदले भी तो कैसे बिना तेरी अंगराई के
तेरी आँखों में सागर और कमर पे पुरवाई है.
उसका बांधना जुल्फ को यूँ फूलों से
क्या किसी ने कभी ऐसी चोट खाई है.
उड़ती हैं तितलियाँ जिसके दीदार पे
हमने तो उसकी एक ही नजर में होश गवाई है.
टूटे भी इश्क़ में तो गम नहीं,
मीठी मिलन के बाद ही दर्दे-जुदाई है.

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तो मेरा चाँद निकले


वो जो अपनी जुल्फों में हैं रात को समेटे
गेसुओं को खोल दें तो मेरा चाँद निकले।
वो जो हया में अपने बंध के मंद-मंद मुस्करा रहे हैं
ये पर्दा हटा दें तो मेरा चाँद निकले।
हजारों आड़ावों से भरी है उनकी खिली जवानी
जरा जाम छलका दें तो मेरा चाँद निकले।

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इसी कश्मकश में रहा


उलझने सुलझाऊँ या जिंदगी बसाऊं, इसी कश्मकश में रहा.
उनको मनाऊं या खुद से ही रूठ जाऊं, इसी कश्मकश में रहा.
हालत कुछ यूँ बदल गए, की खुद को बदलूँ या हालात बदलूँ, इसी कश्मकश में रहा.

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मेरी कोशिश


आसान बन जाती है जिंदगी तेरे मुस्कुराने से
और मेरी कोशिश है की तू मुस्कराये।
पर बहुत काँटे हैं मेरी दामन में
और डर है की एक भी तुम्हे न लग जाए.

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टुटा और टूट कर बिखर गया


इशारों-इशारों में उसने बता दिया
कुछ भी नहीं मिला उससे घर बसाकर।
मैं टुटा और टूट कर बिखर गया
वो भी तन्हा रही सेज को सजाकर।

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जवानी


तेरी जवानी का जब भी चर्चा चला
मयखानों में मेरा नाम चला.
तेरी हसरतों को पाले हुए सब जावाँ
उन्हें मेरे हस्र का पता चला.

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जी-हजूरी


अभी रात का सफर है, दिन की क्या आरजू करें
खंडहरों में रहने वाले किसी से क्या गुफ्तुगू करें?
ख्वाब भी नहीं आते, इस कदर मुफलिसी है
जिंदगी को अब और कैसे बेआबरू करें।
मिला ना ऐसे कोई की करें दिल के हालत बयान
सभी की हसरतें थी की हम बस जी-हजूरी करें।

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क्या पालोगे धुरंधर?


जब दिल टुटा था, संभालना मुश्किल था
अब संभल गया हूँ, तो फिर टूटना मुश्किल है.

इस जमाने की भी क्या खूबी है?
की इसमें बेवफा को, बेवफा ही कहना मुश्किल है.

जो करते हैं वादे हर घड़ी प्यार -मोहब्बत के
उनका किसी पल भी, वादों पे टिकना मुश्किल है.

हया सारी निगाहों की उनकी है झूठी
की इस समंदर में किसी का भी टिकना मुश्किल है.

क्या पालोगे धुरंधर उनके आगोश में जाकर?
जिनके काँधे पे आँचल का भी टिकना मुश्किल है.

Rifle Singh Dhurandhar

ताउम्र


ताउम्र प्यार की आरजू रही.
ताउम्र वो ख़्वाबों में आती रहीं।
ताउम्र सीने में एक बेचैनी सी रही
ताउम्र वो छज्जे से मुस्कराती रहीं।

ताउम्र मैं दौलत कमाता रहा
ताउम्र झोली मेरी खाली रही.
ताउम्र मेरे हौसले टूटते रहे
ताउम्र माँ मेरी, हौसले बढाती रही.

Rifle Singh Dhurandhar

पेंच होता है


प्रेम होता है जिस्म से और दिल रोता है
नजर के खेल में बस ये ही पेंच होता है.

रोकने से रुक जाए ये मुमकिन नहीं
बेवफाओ का बस ये ही अंदाज होता है.

Rifle Singh Dhurandhar