फ़क़ीर मत समझो तकदीर मेरी देख के,
जवानी थी अपनी, अमीरी लूटा गए.
ऐसे -ऐसे शौक पाले थे, वो मांगती गयी,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
फ़क़ीर मत समझो तकदीर मेरी देख के,
जवानी थी अपनी, अमीरी लूटा गए.
ऐसे -ऐसे शौक पाले थे, वो मांगती गयी,
हम सोना -पीतल सब कुछ चढ़ा गए.
परमीत सिंह धुरंधर
उनसे मिलने के पहले, खुद से मोहब्बत थी,
उनसे मिलने के बाद, खुद से नफरत होती है.
पहले हम दिन-रात सोते ही रहते थे,
अब नींदें उनकी, तन्हाई अपनी है.
की कहाँ रखे सीने में उनकी यादो को संभाल के,
अब हर तरफ, चारो और पानी ही पानी है.
बस पानी ही पानी है.
परमीत सिंह धुरंधर
टूटते है शहंशाह के, तो ताज बनते हैं,
ये हम हैं जो उसे आंसुओं में बहा गए.
मुर्ख से मोहब्बत, उजाड़ देती है किस्मत,
हम आज भी अकेले, वो लाखो रिश्ते बना गए.
दिल्रुबावों का दिल और दामन, दोनों ही,
खुसबू से भरा है, मोहब्बत से नहीं.
मोहब्बत तो मैले – कुचले आँचल में उसके,
हम जिसके आँखों में कीचड़, ह्रदय में खंजर उतार गए.
मैं किस खुदा को सजदा दूँ और किस दर पे,
खुदा खुद दिग्भ्रमित है,
जब वो अपनी चुनर को तीज की साड़ी बता गए.
मोहब्बत का जिक्र मुझसे ना करो यारो,
इस कुरुक्षेत्र में जीतकर, वो मृतकों को काफ़िर बता गए.
घूम-घूम कर मांगते हैं,
हर गली-मोहल्ले में औरतों का सम्मान,
जवान जिस्म की चाहत में जो, अपनी बीबी को छोड़ गए.
परमीत सिंह धुरंधर
वो क्या था,
मेरा ख़्वाब,
या कोई हकीकत।
मेरी खुली आँखों,
का सच,
या फिर,
बंद पलकों का,
कोई कमाल।
मैं आज तक नहीं,
जान पाया।
ऐसी बारिश जो,
फिर दुबारा न हुई।
वो मुलाकात,
जिसमे पल तो गुजरे,
साथ, पर मैं,
पहचान न सका.
एक क्षण को वो,
सामने थी, जैसे
सुबह की उषा.
जैसे, बादलों के
योवन को चीरती,
मीठी धूप.
जैसे पलके खुलने,
से पहले, आँखों में
पला मीठा सपना।
आज भी भागता हूँ,
आज भी रोता हूँ,
आज भी ढूंढता हूँ।
सोचता हूँ की,
कहीं तो मिलेंगी,
कभी तो दिखेंगी।
इस बार वैसी,
गलती नहीं।
पर मन भयभीत है,
कैसे पहचानूँगा।
बस देखा ही तो था,
वो भी एक क्षण को।
लेकिन बरसो का सुख,
दे कर, वो छुप गयी,
पूर्णिमा की चाँद सी।
सुबह की ओस सी।
कहीं बदल न,
गयीं हों।
कहीं घूँघट न,
रखती हो अब।
हर पल डरता है,
मेरा दिल,
हर पल भयभीत है,
मेरा दिल।
ये सोच कर की,
कहीं अब घर से ही,
ना निकलती हो.
पर मैं तो घर भी नहीं,
जानता उनका।
ना ही जानता हूँ,
पता उनका।
ना कोई फोटो ही है,
ना कोई जानकारी।
पर एक कोसिस है,
आज भी मेरी लड़ाई है,
अपनी किस्मत से।
शायद मिल जाए,
कभी दिखा जाएँ,
इन राहों में,
दिन में या रातों में,
दिल्ली में या पुणे में।
आज भी ढूंढ़ रहा हूँ.
तो दोस्तों,
उन्हें घरो से निकलने से,
मत रोको।
उन्हें घूँघट या पर्दा करने,
को मत कहो.
तो दोस्तों, उनपे हमला,
मत करो,
उनको जख्म मत दो।
जब तक वो मुझे,
मिल नहीं जाती।
उनका बलात्कार,
मत करो।
की मैं,
अभी तक अपनी,
महबूबा ढूंढ़ रहा हूँ।
परमीत सिंह धुरंधर
रात्रि के तिमिर में,
अन्धकार के शिविर में,
जलाई जा रही हैं लडकियां।
सुबह-सुबह खबर आ रही है,
रेडियों पे, दूरदर्शन पे,
अखबार में की,
मिटाई जा रही हैं लडकियां।
३३ % का आरक्षण,
सबकी ये मांग है.
पर, आज भी,
करीना, विपाशा, प्रियंका,
और अब तो आलिया ही,
सबकी चाह हैं.
फिर भी,
घर-घर में सताई जा रही है लडकियां।
पापा के आने पे रो रोटी को,
गरम कर दे खाने को,
भाई के देखते ही जो,
पापड़ – तिलोड़ी छान दे,
ऐसी निपुण होनहार हो के भी,
मेहमान के सामने,
काम बताई जा रही है लड़कियां।
कौन है आज समाज में,
उनके हश्र का कारन, धुरंधर सिंह,
लोग कुछ भी कहते रहे,
मैं तो गिनायें जा रहा हूँ लडकियां।
अगर कजरा उनसे जो कर दे शिकायत,
तो कजरे को काली कहेंगी।
जो मैं कर दूँ उनके हुश्न की तारीफ़,
तो आगे बढ़ के मुझको गाली पढ़ेंगी।
अगर गजरा उनसे जो कर ले मोहब्बत,
तो इसे गजरे की नादानी कहेंगी।
जो मैं थाम लूँ लहर अपने दिल की,
तो इसे धुरंधर की ठंडी जवानी कहेंगी।
वो सजती हैं खुद को ही देख आईने में,
अपने योवन पे इठलाती हुई.
अगर आईना कह दे जो सच्चाई,
तो फिर उसे बस सीसा कहेंगी।
जो मैं सूना दूँ हाले दिल उन्हें अपना,
तो फिर मुझे एक झूठा ही कहेंगी।
मिलती है वो सबसे हंस के हंसा के,
बस रखती है हमसे ही दूरियां।
जो मैं पूछूं राज उनके इस भेद का,
तो अपनी अदा को वो हया ही कहेंगी।
जो थाम लूँ मैं बढ़ के कलाई,
तो परमीत को बेहया ही कहेंगी।
चलती हैं ढलका के आँचल को सीने से,
और परचित की इसे शैतानी कहेंगी।
जो मैं मिटा दूँ उनपे अपनी जिंदगी,
तो जवानी की मेरी ये नादानी ही कहेंगी।