हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं


मोहब्बत में उनके अर्ज किया था,
की जान तक अपनी लूटा देंगे।
हसरते उनकी भी कम जवाँ न थीं,
बर्बाद ही करके छोड़ेंगे।
मोहब्बत कुछ ऐसे बढ़ी अपनी,
की जमाना तक दुश्मन हो गया.
पता भी हमें तब चला, जब उनकी,
डोली उठा कोई और ले गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

जब से तुम जवान हुई


जब से तुम जवान हुई,
सारा शहर परेशान हुआ.
मयखाने तक सुख गए,
जो तेरा दीदार हुआ.
बादलों ने मंडराना छोड़ा,
भौरों ने कलियों संग,
गुनगुनाना छोड़ा।
आँखों में उतर आएं हैं,
आसमान के सारे तारे।
जब से दुपट्टा तेरा,
कुछ ज्यादा ही ढलकने लगा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं


दर्पणों में चेहरे नहीं गुनाह दीखते हैं,
इसलिए तो हुस्न वाले इनसे सवरतें हैं.
करीब आने पे बोझ बढ़ जाता है,
इसलिए हर रात के बाद वो शहर बदल लेते हैं.
जाने आँचल है या बवंडर -तूफ़ान मरुत्स्थल का,
सैकड़ों को सुला कर बाहों में,
वो अब भी मासूम बन लेते हैं.
इश्क़ के नसीब में उजड़ना ही लिखा है,
ये तो हुस्न वाले हैं जो हवाओं के संग मुख मोड़ लेते हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बटवारा


मोहब्बत में बटवारा कुछ ऐसे हुआ,
तन्हाई मेरे हिस्से,
और शहनाई उनकी झोली में गिरा।
मैनें मुस्करा कर ग़मों में भी,
काँटों को चूमा.
उन्होंने फूलों के सेज को भीं,
बस आंसूँओं से धोया।

 

परमीत सिंह धुरंधर

बेबसी का दंश


दिल के हाथों मजबूर,
अंदाजे – हुस्न पे, कितने लिख गए.
बेबसी का दंश देखिये,
जाते – जाते भी जमाने से,
इश्क़ को बेवफा और हुस्न को,
मासूम लिख गए.
कौन तनहा रहना चाहता है,
इन दीवारों में.
हम उनकी ख़ुशी के लिए,
खुद पे ये जुल्म ढा गए।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जख्मों का समंदर


तेरा मुस्कराना,
मुझे जख्मों का समंदर दे गया.
फासले तो आ ही गए हैं दरमियाँ,
मगर निगाहों का असर रह गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

चुनाव


मैंने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे हुस्न पे थी,
उसने लिखी जो कबिता वो तुम्हारे जिस्म पे थी.
और, तुमने चुन लिया उसे ही,
जिसकी नजर तुम्हारे जिस्म पे थी.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है


मोहब्बत भले न मिली जिंदगी में,
नफरतों ने मुझे आगे बढ़ने का मुद्दा दिया है.
जमाना कर रहा है कसरते मुझे मिटाने की,
मेरी साँसों ने तो बस मुझे जिन्दा रखा है.
किसने कहा की हुस्न के आँचल में जन्नतों का द्वीप है,
हमने तो बस यहाँ साँसों को सिसकते देखा है.
रातों के अँधेरे में तो वफ़ा हर कोई निभा दें,
दिन की चिलचिलाती लू में,
हमने हुस्न वालों को बस छावं ढूंढते देखा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न-इश्क़ और खंजर


खूबसूरत लम्हों में लपेट के जो खंजर चला दे,
वो हुस्न तेरा है.
बिना जुल्फों में सोएं जो ओठों का जाम चख ले,
वो इश्क़ है मेरा।
तुझे गुरुर है जिस योवन पे,
वो ढल जाएगा एक दिन सदा के लिए,
और मैं यूँ हैं चखता रहूँगा योवन का रस,
चाहे रौशनी मेरी आँखों की या आँखे मेरी,
मुद जाए सदा के लिए.

 

परमीत सिंह धुरंधर

खत्तरी और चोली


दो नैना खत्तरी के, खतरनाक है बड़े,
कितनो के चोली के बटन टूट गए.
जो पड़ जाए किसी पे, तो चाल बदल जाए,
कितनो के चुनर आसामन ले गए.
दो नैना खत्तरी के, खतरनाक है बड़े,
कितनो के चोली के बटन टूट गए.
लखनऊ से दिल्ली, हैदराबाद से शिकागो,
कितनो के झूलों में कई लाल झूल गए.
दो नैना खत्तरी के, खतरनाक है बड़े,
कितनो के चोली के बटन टूट गए.
लड़कियां हैं कितनी ही लाइन में खड़ी,
जैसे बिन जल के मछली के प्राण छूट रहे.
दो नैना खत्तरी के, खतरनाक है बड़े,
कितनो के चोली के बटन टूट गए.

 

परमीत सिंह धुरंधर