मेरा पति बड़ा खुद्दार है


खूबसूरत जिस्म पे कई बादल बरसें हैं, कई बादल बरसेंगें,
मगर उनका सफ़ेद झूठ देखिये, कहती हैं वो वफादार हैं.
कल मिली थी बाज़ार में, उदास, टूटी, लड़खड़ाती,
ले गयी मुझसे अपनी तारीफें बटोर कर,
और अंत में कह गयीं की मेरा पति बड़ा खुद्दार है.
जब भी रातों में तन भींगता है और मन सुखा रह जाता है,
आती हैं मेरे पास, अपने मन को भिगोने,
मन के भींग जाने पे, पल्लू संभालती,
मेरी आशाओं को तोड़ती, अंत में कह जाती है,
की तू बड़ा बेकार है, की मेरा पति बड़ा खुद्दार है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

एक दिन ऐसा कलजुग आएगा


रामचन्द्र जी कह गए सिया से, एक दिन ऐसा कलजुग आएगा।
वक्षों पे खेलेंगे कुत्ते,और कुत्तों पे वक्ष होगा।
नारी-हितेषी भटकेगा गलियों में ठोकर खाते,
और जो दलेगा नारी को, वो उसकी बाहों में होगा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कुत्ते और वक्ष


कुत्ते भी क्या – क्या चमत्कार करते हैं!
कोई चुम रहा है उनकी पाँवों को,
तो कोई वक्षों से लगा बैठा है.
अब किस्मत और मौसम,
दोनों कुत्तों के साथ है शहर में.
ठण्ड भरे इस मौसम में,
मैं शायर बनके रोता हूँ,
और कोई उन्हें अपनी बाहों,
तो कोई वक्षों पे सुलाता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और सियार


शेर अब शंख्या में काम रह गए हैं,
क्यों की हुस्न वाले अब सियार चुन रहे हैं.
जो चूस रहे हैं खून अपनी घरवाली का,
दिल्लीवाले उसे अपना मसीहा चुन रहे हैं.
वो रोता है ऐसे भ्रष्टाचार की दुहाई दे कर,
जैसे पति उसका कोई सौतन चुन रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ के हाथों में दौलत बहुत है


जी रहा हूँ इस शहर में बस तेरा जिस्म देख के,
जिसपे रेशम का दुप्पटा फिसलता बहुत है.
लूटा दी अपनी सारी खुशियाँ,
परदेस में जिस दौलत को कमाने में.
उसे कमाने के बाद हम ये समझे,
की माँ के हाथों में दौलत बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रातों में यहाँ कंगन खनकते बहुत हैं


हुस्न सजता बहुत है, रंग और पोशाकों में,
पर उसके दामन में वेवफाई के दाग बहुत है.
वो कहते हैं बार – बार चिल्ल्ला कर,
राम – गौतम बुध की गलतियां।
मैं जब कहता हूँ आम्रपाली – मेनका,
तो वो बैठते, चुप बहुत हैं.
सिर्फ तबाही नहीं होती गोली और बारूदों से,
मोहब्बत में मिटे बेटे पे चित्कारती यहाँ माँ बहुत हैं.
कोई आँखों में काजल लगा के ये न कहे की शर्म है,
रातों में यहाँ, आज भी कंगन खनकते बहुत हैं.
बहुत देखा है मैंने हुस्न वालो का चरित्र,
यहाँ खूबसूरत चेहरों के पीछे छल बहुत हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वो आज भी देखती हैं


वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
घर है, दौलत है,
बच्चे हैं,
फिर भी जाने क्या,
रख्खा है मुझसे,
एक आस लगा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
जवानी है, खूबसूरती है,
शोहरत है,
फिर भी जाने क्या,
रख्खा है खामोस निगाहों में,
मुझसे उम्मीद लगा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.
पति है, पैसा है,
पुरस्कार है,
फिर भी जाने क्या,
मुझसे चाहती हैं,
मेरा सब कुछ मिटा के.
वो आज भी देखती हैं,
मुझे आँखों से,
एक टकटकी लगा के.

 

परमीत सिंह धुरंधर

हुस्न और कुत्ता


एक भीड़ सी लगी है कुत्तों की,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सब – कुछ रख दिया है उनकी चरणों में,
लात खा कर भी वही पड़े हैं,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष में अहंकार बहुत है.
सबसे बड़ी अहिषुण्ता, दोगलापन है ये,
नारी ही उजाड़ रही है घर नारी का,
और हुस्न वाले कहते हैं,
की पुरुष को जिस्म की भूख बहुत है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

करवा-चौथ


मैं दीवाना बहुत था जिन नजरों पे,
वो कातिल बड़ी थी अदाओं से.
मैं ज्यूँ – ज्यूँ उनके नजदीक आता गया,
वो पकड़ती गयीं मुझे हर नब्ज से.
मैं जन्नत समझ के जिसे रुक गया.
वो इतरा -इतरा के फिर,
रखने लगी मुझे ठोकरों में.
मैं सह गया हर सितम जिसकी मोहब्बत में,
उसने करवा-चौथ रखा किसी और के नाम में.

परमीत सिंह धुरंधर

व्रह्मचर्य


एक बार टूटा दिल मेरा ऐसे,
अब सौ भुजंगों का विष सह लूँ.
नारी के प्रेम से अच्छा है,
मैं शिव सा विषपान कर लूँ.
छल रहीं हैं सारी सृष्टि को,
जाने कब से अपने प्रेम में.
इनके सौंदर्य को निहारने से अच्छा है,
मैं लक्ष्मण सा पर्ितयाग कर दूँ.
बस दिखावा है इनका दम्भ,
अपने चरित्र के मान का.
इनको अपना बनाने से अच्छा है,
मैं शुक सा व्रह्मचर्य धारण कर लूँ.

परमीत सिंह धुरंधर