बिजली बन गयी है


तू अब ऐसी हसीं बन गयी है
की किसी की जमीन बन गयी है
बादल बरसे भी तो अब कहाँ
तू उनमे छुपी बिजली बन गयी है.

जेठ की दोपहरी में बरगद की छाया
तू वही ठंडी छाँह बन गयी है.
प्यास से दहकते अधरों के लिए
शीतल, सरिता बन गयी है.
आईने भी दरक रहे हैं तेरे कटाव पे

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समंदर


मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और वो तन्हा बहुत था.
हजारों दरियाएँ बाहों में सिमटी
मगर रूह में उसके प्यास बहुत था.
मिला जो समंदर, वो बेचैन बहुत था
मैं अविवाहित और उसमे दर्द बहुत था.

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बहनों का सम्मान हो


बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

गोद में खेलाया है
हांथों से खिलाया है
चुम-चुम के गालों को
रोते से हंसाया है.
आंसू भी निकले तो
भाइयों के आँख हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

पकड़कर उँगलियों को
स्लेट पे लिखना सिखाया है
भारी हमारे बस्तों को जिसने
कांधों पे अपने उठाया है.
मायके के आँगन पे बस
उनका ही अधिकार हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

पूर्वज थे एक हमारे जो सब कुछ
अपना मिटटी पे लुटा गए.
ये क्या वक्त आ गया है की
हम अपनी बहनों की भुलाने लगे.
हर तिजोरी, ताले की चाबी
बस अपनी बहनों के हाथ हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

तोमरों का लहू अब भी जिन्दा है जमीं
जिसका कोई नहीं, उसके हम हैं भाई.
बस राखी के ही दिन नहीं
सालों भर मायके पे अधिकार हो.
बहनों के क़दमों में निसार,
जन्नत, ताज और संसार हो.
बहनों का सम्मान हो
ऐसा एक बिहार हो,
बस शब्दों से बखान नहीं
कर्म भी उस अनुसार हो.

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दम्भ है वीरों का


टूट कर भी तारे अम्बर के जमीन पे आते नहीं
ये ही दम्भ है वीरों का, वो हार से शर्माते नहीं।

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वो ख़ूबसूरत थी, और मैंने शादी नहीं की


किसी ने पूछा — ज़िंदगी पे क्या ख़्याल है?
मैं मुस्कुराया, धीरे कहा —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वो क्रिश्चन थी, मैं हिंदू,
वो तमिलियन, मैं बिहारी।
वो नाज़ुक, छुईमुई सी, पतली छरहरी,
मैं — धूप में तपने वाला, सोने वाला, सतुआ खाने वाला,
उसकी उँगलियाँ किताबों के पन्नों जैसी,
मेरे हाथ — खेत की मिट्टी सने हुए।
कुछ देर ठहरी थी वो मेरी दुनिया में,
बातें- वादे, हज़ार हुईं,
मगर फिर —
एक दिन वो जो मुकर गई।
उसके बाद फिर चाहत किसी की नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।।
न जाने क्या था उसके मन में,
या शायद सब जानकर भी अनजान थी।
मैं वहीं रह गया — अधूरा, खामोश,
किनारों सा हर पल में टूटता रहा, बिखरता रहा
मगर फिर….
यूँ किसी से घंटों वैसी गुफ्तगू नहीं की।
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।
वक़्त रह गया जो मेरी हथेलियों में,
उस वक्त में वो मेरी नहीं थी.
ज़माना चुरा ले गया जो, वो राह मेरी थी।
लोग कहते रहे —
“किस्मत थी,”
“तेरी नहीं थी,”
“चल छोड़, आगे बढ़,”
मगर दिल जानता था —
वो ख़ूबसूरत थी… और मैंने शादी नहीं की।

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हर लम्हा


ये ज़िन्दगी भी क्या है कि टूटे हैं थोड़ा-थोड़ा हर लम्हा,
ज़िंदा हैं कि क़लम लिखती है बस उसी को हर लम्हा।

चाहा था कि कभी तो सुकून आएगा दिल को,
पर मिलती रही बेताबी की ही सजा हर लम्हा।

आईना भी अब चेहरा देख कर है चुप सा,
बयाँ करता नहीं है मेरे दर्द का किस्सा हर लम्हा।

रिश्तों की किताबें भी अब बोझ लगती हैं,
अधूरी सी कहानी है उनमें छुपा हर लम्हा।

ख्वाबों ने भी अब आंखों से नाता तोड़ लिया,
बस बचा है सहर होने का धोखा हर लम्हा।

चल पड़े हैं सफर में मगर मंज़िलें गुम हैं,
थक कर गिरते हैं फिर संभलते हैं हर लम्हा।

दर्द भी अब अपना सा लगने लगा है,
जैसे कोई अजनबी था बना अपना हर लम्हा।

‘परमित’ लिखता है फिर भी मोहब्बत की बातें,
शायद इसी बहाने बच जाए वजूद हर लम्हा।

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हारा हुआ ये मन विजय की कामना में है


हारा हुआ ये मन विजय की कामना में है,
ना वासना में है, ना ही ये पालना में हैं।
थक चुके पाँवों को अब भी चलना ही है,
कर्तव्य-पथ पे निरंतर बढ़ना ही है।
टुटा हुआ ये मन, उड़ान की कामना में है,
हरा हुआ ये मन, विजय की कामना में है।

सपनों की गंगा बहती है दिल में प्यास लिए,
राहें कठिन सही, मन फिर भी विश्वास में हैं।
जीत की ज्योति जलती है हर इक प्रयास पे,
दूर नहीं मंजिल, सफलता बस दो हाथ पे है।
उड़ना है फिर से, नभ मेरे इन्तिज़ार में है।

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गुस्ताखियाँ


संभाल के रख अपनी अदा,
हुनर को
मैं भी जी रहा हूँ, कमा रहा हूँ
सिर्फ करने को इनसे
हर रात गुस्ताखियाँ।

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छलकने से पहले


छलकने से पहले तेरे आँसु खबर हो जाती है मुझे
तुम्हे अब भी यकीन नहीं की किस कदर चाहा है तुझे
तेरी ख़ामोशी को तुझसे पहले समझ लेता हूँ मैं,
तुझसे पहले राह के काँटों पे पाँव रख लेता हूँ मैं.

तेरे इश्क़ का सागर इतना गहरा है मेरे दिल में,
डूबकर हर बार बस नया साहिल मिलता है इसमें.
तू चाहे जितना भी दूर है मुझसे अभी इस पल में,
मैंने दिल की धड़कनों में सदा ही पाया है तुझे.

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पुष्पों में तब मकरंद बने


तेरे अंगों पे जो अंग मिले
पुष्पों में तब मकरंद बने
हुई चाहत परागों की
तब पाने को भौरें मचल उठे.

तेरे अंगों की मदिरा
अधरों पे मेरे अमृत बन जाए ।
ऋषि छोड़ के मोक्ष का मार्ग
तेरे नयनों के भवर में उपलायें।

चाँद की चाँदनी चुपके से,
उतर के तेरे आँचल में ठहर जाए।
सदियों की प्यास बुझाने को,
तेरे वक्ष जिया को ललचायें।

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