वक्त


इतना भी ना बदल ए वक्त
की मैं ही बदल जाऊं।
तेरे शहर को छोड़ने से पहले ही बिखर जाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर 

मोती बिखरे हैं


ये जो मेरे दिल के ख्वाब टूटे हैं
कह दो समंदर से कुछ मोती बिखरे हैं.
बूंदों को ना ढल्काउँगा अपनी पलकों से
अब भी इन आँखों में कुछ ख्वाब नए हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

सुशांत सिंह राजपूत की जंग जारी रखेंगें


मैं तो मुंबई से पहले ही परास्त हुआ
तुम तो मुंबई तक पहुँच गए.
मैं अपने पहली ही जंग में हार गया
तुम तो कितने जंग फतह कर गए.
यह लड़ाई न मेरी है, ना यह जंग तुम्हारी थी
ये जंग हमारी है, हाँ ये जंग हम सबकी है.
यह जंग है,
हमारे सपनों की उनके गुनाहों से
हमारे अधिकारों की उनकी सत्ता से
हम छोटे शहर की चींटियों की
इन जंगल के हांथियों से.
चाणक्य की
धनानंद के उन्माद और अहंकार से.

आज भले हम हार गए
आज भले दूर -दूर तक
हमारे सितारे धूमिल हैं.
मगर हम शिवाजी के छोटे झुण्ड में आते रहेंगें
और लुटते रहेंगे इनके महलों को
इनकी खुशियों को, तब तक
जब तक औरंगजेब की इस सत्ता
को नष्ट ना कर दे,
तबाह ना कर दे.

हम चीटिंयां हैं चाणक्या के
हम चिड़ियाँ हैं गुरु गोबिंद सिंह जी के
हम कटेंगे, हम गिरेंगे, पर लड़ेंगें तब तक
जब तक विजय श्री हमारी नहीं।
आज चाहे जितना उत्सव माना लो मेरे अंत का
कल तुम्हारा जयदर्थ सा अंत करेंगे।

परमीत सिंह धुरंधर 

अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ


बेलगाम, बेधड़क, बेदाग़, बेबाक हूँ
हर खेल का माहिर धुरंधर
छपरा का मस्तान हूँ
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

रंगों से बना नहीं
मगर हर एक रंग में शामिल हूँ
कुवारियों के आँखों का ख्वाब
विवाहितों के दिल की कसक
मैं अपने बेगम की चोली का रंग लाल हूँ।
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

नागार्जुन का विद्रोह
दिनकर की आवाज हूँ
बुद्ध, महावीर का तप – त्याग
गुरु गोविन्द सिंह जी और चाणक्य
का शंखनाद हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

पनघट पे गोरी की मुस्कान
मस्ती में बहता किसान हूँ
पुरबिया तान, खेत -खलिहान
फगुआ में भाभियों की सताता
निर्लज -बदमाश हूँ.
जी हाँ, मैं खुद में एक बिहार हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर 

गुलिस्तां


मेरे आंसूओं ने तेरी यादों के गुलिस्तां को
ऐसे ज़िंदा रखा है
क्या बसंत, क्या सावन, क्या पतझड़?
हर मौसम फीका है

परमीत सिंह धुरंधर 

मेरे श्रीराम प्रभु


मैं बुलंद हूँ, और बुलंदी मेरी आपके नाम से मेरे प्रभु
मैं भक्त हूँ, और मेरी भक्ति आपके चरणों से मेरे प्रभु।
स्वयं शिव भी लगावे ध्यान जिसका
रुद्रावतार लेकर करे बखान जिसका
टूट जाए माया की हर जंजीर, एक तेरे नाम पे प्रभु
भवसागर में सहारा बस एक तेरा ही, मेरे श्रीराम प्रभु।

Dedicate to the Shri Ram Mandir construction.

परमीत सिंह धुरंधर 

जब से जवान भइल बारू


जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू बोरसी के आग
अब लहकत अलाव भइल बारू।

जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू सरसो के तेल
अब ठंढा हिमताज भइल बारू।

परमीत सिंह धुरंधर

चोली रंगाई ए गोरी


बाँध अ मत ऐसे जोबना ए गोरी
हाहाकार मच गइल बा देख तहार ढोंढ़ी।
आइल बारन छपरा के धुरंधर मैदान में
त आज तहार चोलिया रंगाई ए गोरी।

आरा – बलिया से बच गइलू
मगर आ गइलू नजरिया में
माहिर छपरा के धुरंधर के
त आज छपरा में नकिया छेदाइ ए गोरी।

अभी बाली बा उमर, येही पर त चढ़ी रंग
जतना उड़ेल बारू, उड़ ला
दाना जी भर के चुग ला
त आज पंखिया तहार कटाई ये गोरी।

परमीत सिंह धुरंधर 

जब से जवान भइल बारू-2


जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू
पहिले धामिन रहलू तू
अब गेहुंअन भइल बारू।

डस अ तारु
खेता – खेता चढ़ के
खलिहान – बथान में
केंचुल छोड़तारु।

परमीत सिंह धुरंधर

बेचैन कर जाऊंगा


इस कदर टुटा हुआ हूँ
छूने से बिखर जाऊंगा।
इरादा तो ऐसा कुछ नहीं
मगर ठहर नहीं पाउँगा।

तेरी आँखों में कैद कई
इस खेल के माहिर धुरंधर
मैं तो हारा हूँ मगर
तुझे बेचैन कर जाऊंगा।

First two lines are not mine. It is modified from Gulam Ali jee ghazal.

परमीत सिंह धुरंधर