ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा


पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
तू थाम रही है जाने अब किसकी हाँ बाहें
ना वो शर्म ही रही, ना वो घूँघट ही रहा.

तूने ही हमको मयखाने से लेकर
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ाई थी कभी
अब ना वो देवी ही रहीं, ना साकी ही रहा.
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.

मासूम नयन तेरे और भोले चेहरे से
ना जाने किन-किन को यहाँ धोखा ही मिला?
क्या वफ़ा करे मोहब्बत में कोई ?
जिसकी किस्मत में तू महबूब है मिला।
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.

परमीत सिंह धुरंधर 

नारायण, भोलेनाथ और भगवान्


आम -कटहल
गेहूँ -धान
जामुन -लीची
इन नामों को किसान जीवन देता है.
ख़्वाबों को हकीकत
और जिव्हा को स्वाद देता है.

परमार्थ क्या, स्वार्थ क्या?
अरे राजा के यज्ञ
और ब्राह्मणों के हवन -कुंड में
देवताओं के आव्हान को
सफल करने को घी और अन्न देता है.

धरा को सुंदरता -सौम्यता
पक्षी – कीट, मूषक को
परिश्रम का मौक़ा
गाय – बैल को देवी -देवता
और पत्नी को गृहलक्ष्मी बनने
का सुनहरा अवसर देता है.

पुत्र को आलस
पुत्री को अच्छे वर का ख्वाब
चिलचिलाती धुप और कड़कड़ाती ठंढ में
उषा के आगमन पे
बिना विचलित हुए
किसान हाथों में अपने
हल थाम लेता है.

इंसान इसी रूप में
मुझे नारायण, भोलेनाथ
और भगवान् लगता है.

परमीत सिंह धुरंधर 

समंदर


मैं समंदर हूँ कोई दरिया नहीं
मुझपे हुकूमत, इतना आसान नहीं।
प्यासा हूँ तेरी लबों का
मिट जाए एक रात में, ऐसी प्यास नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर 

मोहब्बत


दर्द में उनसे तू शिकायत न कर
ये शहर है उनका, तू बगावत न कर.
मिलेंगे तुझे कई हुस्न इस सफर में
यूँ ठहर कर उनसे मोहब्बत न कर.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़


दरिया का सफर देखिये
समंदर के इश्क़ में
राहें बदल – बदल कर मचली
मगर मजिल बस एक है.

किनारें टूटते हैं,
डूबते हैं, बिखरते हैं
मगर साथ-साथ चलते हैं
इस सफर में
इनका साथ अटल है.

परिंदों का सफर देखिये
आसमान के इश्क़ में
छोड़कर डाल, घोंसला, दाना-पानी
निकल पड़ते हैं उषा के आगमन पे.

हारते, उड़ते, प्यासे
संध्या पे लौट आते हैं
मगर अगली सुबह फिर
से वही चाहत, वो ही उड़ान
क्योंकि उनका उत्साह अटल है.

फूलों का सफर देखिये
उषा के इश्क़ में
खिलती में हर सुबह
उषा के चुम्बन से.

टूटती हैं, बिखरती हैं
काँटों से उलझ -उलझ कर
बदरंग हो जाती हैं.
मगर सुबह फिर नई कलि खिलती है
इनका विश्वास अटल हैं.

परमीत सिंह धुरंधर 

धीर बन- वीर बन.


पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

मानव तू साधारण सा
ठान ले तो दानव सा
अंत ना हो जिसका
उस दम्भ का बिस्तार कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

माया – मोह निकट नहीं
मन – मष्तिक विकट नहीं
काल के कपाल पर
तू अपना नाम गढ़.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

निर्मल पवन सा
निर्भीक गगन सा
पावन गंगा सा
हर दिशा में प्रवाह कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

काँटों और फूल से
कृपाण और शूल से
तन का सम्बन्ध जोड़
मन को ना अधीर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

पत्नी ना पुरस्कार
अपमान ना तिरस्कार
खोने को अपना सब कुछ
हर क्षण खुद को तत्पर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट और चीरहरण


मेरा इश्क़, कोई हवस नहीं है
अतः यह किसी भीड़ की मोहताज नहीं है
हुस्न और मेरी राहें हैं अलग -अलग, पर
मेरा मकसद घूँघट उठाना है, कोई चीरहरण नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ पे कोई और रंग


ये दिल, ये दर्द, ये दवा
इश्क़ पे कोई और रंग चढ़ाता भी तो नहीं।

ये रोटी, ये कपड़ें, ये मकान
शहर में अब कुछ भाता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

उम्मीदें लगाईं


जो दौलत कमाई
जो शोहरत कमाई
शहर में जो हिम्म्मत दिखाई
सब लूटने लगा है
सब बिखरने लगा है
तूने आँखों में जो
काजल लगाईं।

ये मोहब्बत है मेरी
या शिकायत है खुद से
जो कातिल है मेरा
उससे ही उम्मीदें लगाईं।

परमीत सिंह धुरंधर

श्री गणेश और मूषक


पिता और मैं, जैसे
सुबह की लालिमा
और चाँद की शीतलता
दोनों एक साथ
जिसका स्वागत करते
पक्षीगण कलरव गान से.

पिता और मैं
सुसुप्त अवस्था में
जैसे कोई ज्वालामुखी
और बहुत अंदर उसके सीने में
कहीं आग सा धड़कता मैं.

पिता और मैं, जैसे
छपरा का कोई धुरंधर
त्यागकर अपनी चतुराई
और चतुरंगी सेना
बना मेरा सारथि
और कुरुक्षेत्र में उतरता
नायक बन कर मैं.

पिता और मैं, जैसे
शिव और भुजंग
पिता और मैं, जैसे
हरी और सुदर्शन
पिता और मैं, जैसे
सूर्य और अम्बर
पिता और मैं, जैसे
श्री गणेश और मूषक।

परमीत सिंह धुरंधर