चमकीली ये दुनिया मेरे बिहार सी नहीं


धुप ये शहर की मेरे गावँ सी नहीं
कमर तेरी पतली मेरे यार सी नहीं।
ढूंढता हूँ जिसको वो सितारों में नहीं
चमकीली ये दुनिया मेरे बिहार सी नहीं।

जहाँ हम ही हम थे और थे बाग़ मेरे
मोहब्बत की वो जमीन यहाँ तो नहीं।
तुम कहते हो हम भुला दें वो बातें
हम कहतें हैं, वो दिल हैं कोई याद तो नहीं।

ये रंग बाजारों का, उन गुब्बारों सा नहीं
जिसे फोड़ते भी हम थे और फुलाते थे हमीं।
मीठी है तो, मुबारक तुम्हे ये दुनिया
इन सपनों में मेरा वो गावं तो नहीं।

कदम जो ये उठे थे जिस मुकाम के लिए
उस मुकाम पे मेरा वो मकान तो नहीं।
चूल्हे की चाय से काट जाती थी सर्दी
वो गैंठी सुलगाती मेरी माँ तो नहीं।

दिल चाहे वो गलियाँ जिसपे पेड़ हों
छावं में जिसके बैठते सब एक हो.
ऐसी होगी जिंदगी, मैंने सोंची तो नहीं।
ये शोर, ये धुंध मुझे रास आती नहीं।

यहाँ चेहरों के पीछे कहानियां कई
वहाँ चौखट के पीछे भाभियाँ कई.
यहाँ पब-बार में मज़ा पनघट का तो नहीं
जो चला था वहाँ से वो यहाँ मिलता भी नहीं।

वो छोड़ा जिसे इस महफ़िल के लिए
ये महफ़िल हमें जानती भी नहीं।
वो माटी वो महुआ, इस मदिरा से थी नशीली
और वो नशा आज तक उतरा भी नहीं।

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खिलौना


सपनों का शहर अब खिलौना बन गया है
मौसम कोई भी हो, गम बिछौना बन गया हैं.
जिन बाहों को हमने पहनाई चूड़ियाँ
कल रात उन चूड़ियों को कोई तोड़ गया हैं.
किस-किस का हिसाब
किस-किस की किताब में लिखा है.
मेरी कलम ने बेवफा में
सिर्फ उसका नाम लिखा है.

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जिंदगी


मोहब्बत के बिना भी जिंदगी होती है
सिर्फ किताबों में ही नहीं, असलियत में भी.
मुस्काराने से राह आसान होती है
जमाने में ही नहीं, आईने से भी.

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नजर भर रही


नजर की ख्वाइस, नजर भर रही
शहर को पता है, वो बस सहर भर रहीं।
मैं बुलाता भी उनको तो कैसे मगर?
जो उम्र भर का कह के, बस एक पहर भर रहीं।
सुना है शहर में ऐसा कोई घर नहीं
जहाँ नहीं वो कभी एक पहर भर रहीं।

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वक्त ऐसा भी नहीं


वक्त ऐसा भी नहीं
तारीफ़ के मैं काबिल नहीं
वक्त जिसको भी देख रहा
वो मेरा साहिल नहीं।

ख्वाब कितने टूट गए
फिर भी मैं चल रहा
रुक जाऊं मैं कहीं
वो शहर मुझे मिला नहीं।

तू खुदा हैं कहीं तो
दिख मुझे रहा नहीं
मैंने जिसे खुदा कहा
वो मेरा अब रहा नहीं।

उम्र भर की ख्वाइशे
सिमट कर जहाँ एक हुई
वो भी कोई चुरा गया
किस्मत का धनि मैं रहा नहीं।

दर्द में डूबी हो रात
और वो ना याद आएं
हो वो एक ना ख्वाब आयें
ऐसी कोई रात यहाँ नहीं।

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राही बदल लूंगा


मैं अपनी राहों को नहीं बदलूंगा, मैं अपने राही बदल लूंगा।
मंजिलें मेरे इंतज़ार में हैं, तो मैं मोहब्बत छोड़ दूंगा।
कितने ऐसे जिस्मों को छोड़ा हैं जिंदगी के इम्तिहान में
मैं इम्तिहानों से नहीं, खुशियों से मुख मोड़ लूंगा।

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बेवफा


नजर की ख्वाइशें नजर में रह गयी
जो दिल में दबी थी वो दिल में रह गयी.
हम पीते रह गए जिसकी याद में
वो सब मिटा के डोली चढ़ गयी.
कुछ भी नहीं इश्क़ में एक धोखा के सिवा
और बेवसी देखिये की बेवफा को कलम वफ़ा लिख गयी.

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माँ की निगाहों में है


फ़िज़ाओं में रौशनी सितारों से नहीं, दुआओं से है
मेरी राहें-मंजिल मेरी माँ की निगाहों में है.

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जख्म


दरिया और समंदर में, समंदर गहरा है
तेरे हिज़्र का जख्म, हर जख्म से गहरा है.
जझुकि तेरी नजर, तेरे शर्म का पर्दा है
पर इनसे चलें तीरों का जख्म बहुत गहरा है.

RSD


मुसाफिर हैं जो तन्हाई के उनका शौक भी तन्हाई है
जो छू के बैठें हैं तुझे, उनकी चाह में नहीं अब कोई अंगराई है.

जिस्म की ख्वाइसे दिल की ख्वाइशों से जुदा है क्या
ये जिसे तुम कह रहे हो मोहब्बत, वासना से जुदा ही क्या?

मेरी जिंदगी ही क्या जिसमे तेरा कोई जिक्र नहीं
वसल न सही, ना सही, तुझसे कोई हिज्र नहीं।

वो आँखों से इज़ाज़त लेने का दौर कहाँ
जब हम निगाहों से रोटी बदल लेते थे
वो मोहब्बत का दौर कहाँ
जहाँ बिना वसल के रात गुज्जार लेते थे.

ना पूछ की कैसे गुजरी है रात
ये पूछ की कैसे गुजारी है रात.
वो जो कहते थे हंस -हंस के हर बात
अब बिना कहे काट लेते हैं कई-कई रात.

साकी तेरा मुस्कराना गेम इलाज़ है मेरा
ये बस शराब नहीं दवा- ए -फ़िराक है मेरा।

सुकून मिला न मुझको शबे-वसल के बाद
कुछ ऐसे टूटा हूँ मैं तुम्हारे हिज़्र के बाद.

मोहब्बत में ताक्काबुर उनका अंदाज है
इश्क़ की मानिल कुछ नहीं बस गेम-फ़िराक़ है.

मंजिल तक आते -आते हर कारवां छूट गया
हर किसी के नसीब में कहाँ ये मुकाम है.

साकी पिला कुछ ऐसे की मयकदा घर बन जाए
वसल तो मुमकिन नहीं जख़्म भर जाए
कई रातों से आँखों को नींद मय्यसर नहीं
तू बस मुस्करा दे की कोई ख्वाब मिल जाए.

खुदा जानता है काफिर वो नहीं जिसने छोड़ दी इबादत तेरे हिज़्र के बाद
काफिर वो है जो मांगता है जन्नत और उसकी ७२ हूरें तुझसे वसल के बाद.

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