आज फैसला कर लें


आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं चुमू तेरे लबों को ऐसे
जैसे भगवान् शिव ने उठाया था
प्याला गरल का.

आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं थाम लूँ तुम्हारी कमर ऐसे
जैसे श्री राम ने चढ़ाई थी
शिव-धनुष पे प्रत्यंचा।

आँखों – से – आँखों
में आवो आज फैसला कर लें.
मैं बांध जाऊं
तुम्हारी जुल्फों में ऐसे.
जैसे देवव्रत ने की थी
भीषण, भीष्म – प्रतिज्ञा।

परमीत सिंह धुरंधर

मयखाना किधर है?


वो जो कल तक मुझसे पूछते थे
की मयखाना किधर है?
आज जमाने को बता रहें हैं की
मयखाना किधर है?

वो जिनको शिकायतें थीं कल तक
की हम उन्हें देखते नहीं हैं.
की हमें शिकायत है की अब
उन्हें देखते नहीं हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

इश्क़ ऐसे भी न कर


इश्क़ ऐसे भी न कर
की पथरा जाएँ माँ की आँखें।
ऐसे भी खामोस कर दिया है
शहर को उसने।

परमीत सिंह धुरंधर

ईसामसीह – रामचंद्र जी संवाद


ईसामसीह जी कह गए रामचंद्र जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
तन्हा – तन्हा सा Crassa
तन्हाई में गायेगा।

रामचंद्र जी कह गए ईसामसीह जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
अकेला ही Crassa
वन में फूल खिलायेगा।

ईसामसीह जी कह गए रामचंद्र जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
हिन्दू – मुस्लिम, सिख – ईसाई
हर लड़की से Crassa चोट खायेगा।

रामचंद्र जी कह गए ईसामसीह जी से
एक दिन ऐसा कलयुग आएगा
हर ब्रह्मास्त्रा को Crassa
अकेला ही काट गिरायेगा।

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


मोहब्बत
एक दास्ताँ बन जाए.
कुछ ऐसे करो
की कोई निशाँ बन जाए.

आज हम हैं तुम्हारी बाहों में
कल हों या ना हों.
इस कदर चुम लो इस एक रात में
की जिंदगी आसान हो जाए.

परमीत सिंह धुरंधर

ईसामसीह बोले रामचंद्र से


29 नवंबर से 16 दिसंबर तक
आते – आते
सत्ता बदल गयी.
ईसामसीह बोले रामचंद्र से
लड़की तो Crassa पे भारी पड़ गयी.

ऐसे पलटी
वादे करके, सपने दिखा के
ये तो हमारी सोच से भी
आगे निकल गयी.
ईसा बोले रामचंद्र से
लड़की तो Crassa पे भारी पड़ गयी.

धीरज से गंभीर
मुस्करा कर
फिर बोले रामचंद्र जी, ईसामसीह से
कब नारी हुई है किसी की?
अतः लड़की Crassa पे भारी पड़ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

सत्ता का दम्भ


सत्ता का दम्भ ही
सत्ता का नाश करता है.
गजराज मद में हो
तो महावत पे प्रहार करता है.
प्रेम अगर सच्चा हो तो
हुस्न किसी और के लिए
श्रृंगार करता है.

परमीत सिंह धुरंधर

साधू और शिव


साधू बनकर भी मैं
त्याग नहीं कर पाया मोह को.
घर त्यागा, माँ को त्यागा
त्याग नहीं पाया बंधन को.

दो नयना अब भी हर लेते हैं
चैन मेरे मन का.
सर्वस्व का त्याग कर के भी शिव
मैं बाँध ना पाया अपने मन को.

परमीत सिंह धुरंधर

उषा और पंक्षी


पंक्षी कलरव करते हैं
पंक्षी अभिनय करते हैं
ए उषा देख तेरे इंतज़ार में
पक्षी कैसे मौन धारण रखते हैं?

सूरज की प्रथम किरण पर
चहचहा उठते है ये
अचानक दुनिया भर की खुशियाँ
उमंगें प्राप्त कर,
नयी जवानी में नृत्य करते हैं.

और बिना किसी पल देरी के
तेरे स्वागत में,
क्षितिज की ओर,
नीले आसमान में
पंख कोलकर उड़ान भरते हैं.

पंक्षी कलरव करते हैं
पंक्षी अभिनय करते हैं
ए उषा देख तेरे इंतज़ार में
पक्षी कैसे मौन धारण रखते हैं?

परमीत सिंह धुरंधर

शहर में


हमसे क्या पूछते हो पता शहर में?
हमें खुद नहीं पता की है हम किस शहर में.

बस जुबान छोड़ के मेरा
बाकी सब कुछ बदल दिया इस शहर ने.

भटकते रहते हैं जाने किसकी खोज में
ये भी नहीं पता की आये थे कहाँ से इस शहर में?

परमीत सिंह धुरंधर