रौशनी


रौशनी को ही ढूंढते रहोगे या जलाओगे चिरागों को भी
मोहब्बत ही करते रहोगे या बनाओगे किसी को अपना भी.
बहुत मुश्किल है काटना अकेली ये जिंदगी
जवानी तो गुजर गयी भटकने में, भटकोगे क्या भुढ़ापे में भी.

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मोहब्बत


जो मिल रहे हैं तुझसे वो तेरे अपने है क्या
जो दूर हैं वो देख रहे तेरे सपने है क्या?
मैं नहीं तो तू नहीं, तू नहीं तो मैं नहीं,
बस ये ही एहसास है मोहब्बत
इसके आलावा भी कोई मोहब्बत है क्या?

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काला काजल


काला काजल तेरी आँखों में उतर कर किसी का ख्वाब बन गया
जो भी मिला, मिलकर तुझसे, तेरा गुलाम बन गया.
तेरे पावों को चूमकर इतराते हैं धूल-कण
तेरी गालों पे बरस कर, बादल झूम रहा.
तेरी बलखाती कमर पे सारा जहाँ थम गया.
कौन जी रहा है जिंदगी, एक नाम तो बता
तूने जिससे भी मुख फेरा, वो ख़ाक बन गया.
तू खोले अपनी खिड़की या किवाड़ तो करने को दीदार
तेरे दर पे आके सारा जमाना बैठ गया.

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किसका है जमाना


ये दुनिया के धोखे, ये रिश्ते, जमाना
मेरी सरहदों को ना नापे ज़माना।
क़यामत की रात को होगा फैसला
किसका खुदा है और किसका है जमाना।
गैर भी मिलकर समझाने लगे हैं
कब हुआ है किसी का कभी ये जमाना?

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सीढ़िया


तू कैसे चढ़ लेती हैं सीढ़िया मेरे खुदा के दर की
उसके मासूम बन्दों को मिटा के.
अरे बेबसी देख मेरे खुदा की
ऐसे सितम पे भी बैठा है मौन धारण कर.

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पाक रिश्ता


मेरी जिंदगी को दर्द यूँ डुबाने लगा
ना प्यास ही मिटी ना यार ही गले लगा.
वो सबको सुला रहीं हैं अपनी बाहों में
बस एक हमसे ही पाक रिश्ता उनका रहा.

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तपिश


तपिश बढ़ी धरती की तो बादल छा गए
बरसने ही वाले थे की हवा उन्हें उड़ा गए.
यूँ ही रह गयी प्यास मेरे अधरों पे
नजरें लड़ाते-लड़ाते वो मेहँदी रचा गए.

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मोहब्बत


मोहब्बत में किसी को कुछ भी हासिल नहीं है.
इस समंदर का कोई साहिल नहीं है।

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करीब


वो मिली और बैठी इतने करीब में
तन्हाई लिख गयी ताउम्र मेरे नसीब में.
दरिया कब हुई है किसी किनारे की?
मगर डूबते हैं वो इसी यकीं में.

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हक़


अब बारिशों का मौसम वैसा न रहा
रूह, रूह न रही, दिल, दिल न रहा.
सुखाता नहीं हूँ जिस्म को अब भींगने के बाद
दुप्पटे पे उनके मेरा हक़, अब वो हक़ न रहा.

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