पापी मन


पापी मन के पाप को हर के
तार दो मुझे नाथ मेरे।
सबकुछ पाकर भी ना संतोष हुआ
तृप्त करो मुझे नाथ मेरे।
राहें मिलती गयी, मैं भटकता गया
समझ ना पाया प्रभु आपकी माया।
चरणों में आपके शरणागत हूँ
कृपा करो अब नाथ मेरे।

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अटल हो कर अनंत तक


ना गूढ़ रहो, ना मूढ़ रहो
मानव हो तो सरल रहो.
है हाथ में कलम तो
सत्य को साकार करो.
ना तो हल को धारण
कर किसान बनो.
हो अगर वंचित दोनों से
तो तन का श्रम से श्रृंगार करो.

जीवन का सार यही
गीता में प्रमाण यही
जय-विजय की कामना से रहित
अपने पथ का, अपनी मंज्ज़िल तक
स्वयं निर्माण करो.
अन्यथा भगीरथ सा
अटल हो कर, अनंत तक
अंतिम प्रयास करो.

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सावन की ये काली घटायें


गगन को मगन करके
बादलों में दामनी को चंचल करके
सावन की ये काली घटायें
धरा पे मृग, मोर, पुष्प को
प्रेम से पुलकित कर रहे.
भ्रमर को भ्रमित करके
नवयौवना के ह्रदय को झंकृत करके
सावन की ये काली घटायें
बरसो की विरह को नवरस
से पराजित कर रहे.

दूर बस तुम्ही हो मेरे साजन।
दिन साल हुए, साल विशाल हुए
तुम जाने किस मोहनी के मोह में
मेरी साँसों को निष्प्राण कर रहे.
नसों में नशा उतारू तो क्यों?
अधरों पे प्यास बसाऊं तो क्यों?
उर्वरित धरा को जब तुम
बीज-रहित रख रहे.
सावन की ये काली घटायें
तुम्हारे बाजुपाश-रहित
मेरे मन को व्यथित कर रहे.

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है जिंदगी कितनी खूबसूरत


है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है
पिता के पथ के पत्थरों का जिन्हे अभी तक पता नहीं है.
आँखों की जिनकी मीठी नींद को माँ कई रात सोइ नहीं है.
माँ के चरणों में जिन्होंने सर अभी तक झुकाया नहीं है.
है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है.
क्या लिखें शब्दों में तुम्हे, आँखों ने तुम्हारे बाद कोई देखा नहीं है?
प्यासे हैं वो ही अधर, जिन्होंने शिव भांग आपका चखा नहीं है.
है जिंदगी कितनी खूबसूरत अभी इन्हे पता नहीं है.

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सफर


प्राप्त क्या करे इंसान जब प्यास अधरों पे हो?
गुनाह क्या करे इंसान जब जिंदगी किसी की बाहों में हो?
रहा भी ना जाए बिना सोये जब किसी की जुल्फों में
रहा भी न जाए जब किसी को थामे बाहों में
तो थके भी कैसे, जब सफर किसी के आगोस में हो?
दूर जाए भी तो क्या इंसान, जब संसार किसी के वक्षों पे हो?

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मेरे गजानन


प्रभु, प्रभु आपके चरणों का मैं एक दास हूँ
मेरे गजानन, नित्य करता मैं आपको प्रणाम हूँ.
लाज रख लो मेरी मेरे गणपति,
मेरे गजानन, हर तरफ से हारा, मैं एक लाचार हूँ.
कुछ भी नहीं आँखों में मेरे आँसूं के सिवा
मेरे गजानन, हर तरफ से ठुकराया, मैं इतना कंगाल हूँ.
मौत से पहले एक जीत तो दे दो
मेरे गजानन, थका -हारा मैं इतना हतास हूँ.
कैसे छोड़ दूँ ये आस आपसे मेरे गणपति
मेरे गजानन, जब मैं केवल आपका ही ख़ास हूँ.

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मेरे देश की धरती


मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे – मोती
मेरे देश की धरती।
सींचे जिसको गंगा-जमुना, और कावेरी लहराती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पतली कमर तरकस सी, नैनों से बाण चलाती
मेरे देश की धरती।
माँ के तन पे फटी है साड़ी, फिर भी माँ मुस्काती
मेरे देश की धरती।
पूजते हैं बैल – गोरु, और गाय रोटी पहली खाती
मेरे देश की धरती।
भयभीत होकर जहाँ से लौटा सिकंदर, ऐसी बिहारी छाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ नानक-कबीर के दोहों को, दादी-नानी हैं गाती
मेरे देश की धरती।
जहाँ पग-पग पे प्रेम मिले, पल-पल में मिले थाती
मेरे देश की धरती।
सौ पुश्तों तक लड़े शिशोदिया, रंगने को बस माटी
मेरे देश की धरती।
जहाँ धूल में भी फूल खिले, पत्थर नारी बन जाती
मेरे देश की धरती।
सर्वश्व दान करके, बन गए भोलेनाथ त्रिलोकी
मेरे देश की धरती।
पिता के मान पे श्रीराम ने कर दी गद्दी खाली
मेरे देश की धरती।
भगीरथ के एक पुकार पे, स्वर्ग से गंगा उतरी
मेरे देश की धरती।

मिट गए हूण टकरा के स्कंदगुप्त से, किनारो पे लहरे मिटती
मेरे देश की धरती।
जहाँ हर दिल में गणपति, और नित्य होती उनकी आरती
मेरे देश की धरती।
इस मिटटी की यही बात है यारों, यहाँ मिट जाती हर दूरी
मेरे देश की धरती।
काँधे पे जहाँ हल शोभित और हाथों पे चमकती राखी
मेरे देश की धरती।
खेत-खलिहान, बँसवारी से पनघट, नैनों से नैन लड़ाती
मेरे देश की धरती।
पतली-कमर, बाली-उम्र, डगर-डगर, चढ़ती जवानी, इठलाती
मेरे देश की धरती।
कितना लिखूं,लिखता रहूं, खुशबू फिर भी नहीं मिटती?
मेरे देश की धरती।

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भरम


सरेआम दिल को ठुकरा कर वो जा रहे हैं मुस्कराकर
ना रहीं अब ख्वाइशें, ना रहा कोई ही भरम.


लिख भी दूँ तो क्या लिखूं, ये कलम -दवात बता?
लिखने से भला कब मिटा हैं किसी के दिल का दरद?


थाम रहीं हैं मेरे सामने ही वो किसी की बाहों को
जाने कैसे ज़िंदा हूँ, ना हट ही रही उनसे नजर.

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सखी


रे सखी, रे सखी, रे सखी
बाटे, आसमा में चाँद रे सखी
लागल दिल में घाव रे सखी.

उड़ गइल चिड़ैया डाल से
रह गइल बस घोषला।
कैसे बुझाईं, तू ही कह$?
मन के ताप रे सखी.
रे सखी, रे सखी, रे सखी
बाटे, आसमा में चाँद रे सखी
लागल दिल में घाव रे सखी.

दूयेगो दिन न खनकल कंगना
दूयेगो रात न बाजल पायलिया।
केकरा के देख के अब सुलगाई
चूल्हा के आग रे सखी.
रे सखी, रे सखी, रे सखी
बाटे, आसमा में चाँद रे सखी
लागल दिल में घाव रे सखी.

ना रहल मायका अब आपन
ना बनल ससुराल ही आपन
तहरा के छोड़ के, के-के सुनाई
दिल के हाल रे सखी.
रे सखी, रे सखी, रे सखी
बाटे, आसमा में चाँद रे सखी
लागल दिल में घाव रे सखी.

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प्रिये


तड़प रहा है कोई तुम्हारे प्यार में प्रिये
और तुम हो की मग्न हो किसी और के संसार में प्रिये।

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