अभी तुम हसीन हो, अभी नाजुक बड़ी हो
अभी मिलेंगे तुमको गली-गली में मजनू।
अभी तुम नई हो, कातिल छरहरी हो
अभी तुम्हारे लिए चमकेंगे सारे जुगनू।
जिधर तुम डाल दो अपनी ये दिलकस नजर
उधर ही बैठे हैं तुमपे लुटाने को सभी आबरू।
Rifle Singh Dhurandhar
अभी तुम हसीन हो, अभी नाजुक बड़ी हो
अभी मिलेंगे तुमको गली-गली में मजनू।
अभी तुम नई हो, कातिल छरहरी हो
अभी तुम्हारे लिए चमकेंगे सारे जुगनू।
जिधर तुम डाल दो अपनी ये दिलकस नजर
उधर ही बैठे हैं तुमपे लुटाने को सभी आबरू।
Rifle Singh Dhurandhar
प्रेम होता है जिस्म से और दिल रोता है
नजर के खेल में बस ये ही पेंच होता है.
रोकने से रुक जाए ये मुमकिन नहीं
बेवफाओ का बस ये ही अंदाज होता है.
Rifle Singh Dhurandhar
मदिरा मेरे कंठ से उतर कर कर गयी दिल पे जोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
शाम को जो पुलकित-पुष्प थी, काँटे हो गयी होते भोर
छोटी सी इस जिंदगी में कितनी कच्ची है प्रेम की डोर?
Rifle Singh Dhurandhar
मेरी चिड़िया, चुग ले दाना
छोड़ आसमा, बना ठिकाना।
तेरा है कोई, इस जहाँ में
समझ ले तू भी ये अफ़साना।
प्यासी रातें, तड़पते दिन हैं
संसार यही है, आँगन-चहचहाना।
Rifle Singh Dhurandhar
समंदर का शौक रखते हैं
सिंकदर से बेख़ौफ़ रहते हैं.
इस शहर में ऐसे भी लोग हैं
जो इश्क़ में तन्हा रहते हैं.
Rifle Singh Dhurandhar
जहाँ दर्द मिले दिल को उस दर पे नहीं जाना
बहुत धोखा है इश्क़ में, ये धोखा तुम नहीं खाना।
जो फूल खिल रहे हैं, मुरझा जाएंगे एक दिन
बिना खिले ही तुम मुरझा नहीं जाना।
माना की लम्बी है बहुत, अँधेरी ये रात
घबराकर कहीं तुम कोई ठोकर नहीं खाना।
बहुत हंस कर मिलते है अब लोग अब
ऐसे लोग भले नहीं होते
तुम ऐसे लोगो के गले लग नहीं जाना।
कट जाएगा ये भी वक्त तन्हाई से भरा
रिश्तों में दरार नहीं लाना।
Rifle Singh Dhurnadhar
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे छुप ल, या कतनो तेल मल ल
अंग – अंग पे ताहार आज दिहन निशानी।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
साल भर से चल अ तारु मटक-मटक के
हर अ तारु दिल सबके नयना के चटक से
तहरा नस – नस में आज भाँग घोलाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
चाहे कूद ल, चाहे फाँद ल
चुनर -चोली आज ताहार दुनो रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
कमरिया पे अपना हिला व् तारुन छपरा
सुगवा फाँस अ तारु लहरा के जोबना
बीच छपरा में आज तहार जोबना रंगाई।
छपरा के बाबूसाहेब लेके पिचकारी
निकलल बारन रंगे के धोबन तहार जवानी।
Rifle Singh Dhurandhar
होली में आप रहती और मैं रंगता
जवानी का नशा बिना भाँग के ही चढ़ता।
भींगती तेरी चोली मेरे रंग से
और जोबन पे तेरे मेरा रंग चढ़ता।
Rifle Singh Dhurandhar
मैं तो परिंदा बेबस जिंदगी में
क्या सुबहा, क्या शाम मेरी?
उड़ता हूँ तो धरती छीन जाती
लौटता हूँ तो आसमा, कहाँ मेरी।
Rifle Singh Dhurandhar
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
कई जुल्म की आँधिया गुजरी हैं इन राहों से-२
पर हार बार जख्म तेरे
पर हार बार जख्म मैं तेरे नैंनो से खाता हूँ.
और क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं क्या मिटा दूँ दिल से यादे ए जमाना?
मैं खुद को मिटाने की ही
मैं खुद को मिटाने की ही हर बार चल रखता हूँ.
हर रात समंदर को मैं स्याह करता हूँ
मैं तन्हा -तन्हा सा बर्बाद रहता हूँ.
Rifle Singh Dhurandhar