वो बदल गए राहें ये सोच कर की हम तन्हा रह गए,
सफर ही कुछ ऐसा था की हम मुस्करा उठे.
परमीत सिंह धुरंधर
वो बदल गए राहें ये सोच कर की हम तन्हा रह गए,
सफर ही कुछ ऐसा था की हम मुस्करा उठे.
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे चेहरे का दीदार,
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तेरी सूरत ही बस मासूम है,
लालच छुपी है इन आँखों में
तेरा दिल तो है बड़ा मक्कार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तेरे चेहरे पे मक्कारी
तेरी आँखों में होशियारी
तूने चाहा है बस दौलत बेसुमार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
तूने सच्चों को रुलाया
तूने मासूमों को ठोकर लगाया
तूने किया है हर दिल से खिलवाड़
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे माँ भी पसंद नहीं
तुझे बहन भी भाती नहीं
तूने तोड़ा है हर परिवार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
जो भी तेरा हुआ है
वो कब खाट से उठा है
तूने दर्द दिया है आपार
अरे रे रे बाबा न बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा न बाबा।
तेरे कांटे का नहीं कोई इलाज
तेरा झूठ भी लगे लाजबाब
तेरा इश्क़ का है कारोबार
अरे रे रे बाबा न बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
कब तुझसे कोई बचा है
तूने जब भी नजर डाली है
तेरा हुस्न ही है तेरा हथियार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तूने खेल हजारों खेलें
घर हजारों लूटें
एक औरत होकर तू, करती है औरत पे बार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा ना बाबा।
तेरे चेहरे की ये चमक
तेरी आँखों का ये शर्म
चन्द सिक्को की खनक पे
बिक जाता है हर बार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तेरी आँखों की मधुशाला
ये तो है विष का एक प्याला
स्यवं शिव ने किया है इंकार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तू बस में किसी को भी कर ले
अपनी मोहक अदा से
मैं तो भक्त हूँ भोलेनाथ का
मेरा मुश्किल है शिकार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
तुझे कौन करेगा प्यार
अरे रे रे बाबा, ना बाबा।
This is dedicated to Shear Rahi Bastavi as it is inspired by his geet “Tere Payal ki Jhankaar, are re re baba na baba”.
परमीत सिंह धुरंधर
वक्षों का अभिनन्दन हो
नगर – नगर में बंदन हो.
रूप चाहे कैसा भी हो?
पर वक्षों पे समंदर हो.
अपूर्ण है सम्पूर्ण प्रकृति
देवो से दानवों तक की.
ह्रदय चाहे जितना भी क्रूर
और कठोर हो.
ह्रदय वही है
जिसमे वक्षों के लिए स्पंदन हो.
Dedicated to the greatest showman of Indian cinema #RajKappor
परमीत सिंह धुरंधर
पल – पल में मोहब्बत में अंदाज बदलते हो
और कहते हो की हाय, शर्म से मर ही जाते हो.
फिर किसे ना हो शौक तुमसे मोहब्बत का?
जब इतनी आदाओं से तुम मुलाक़ात करते हो.
कैसे संभाले कोई दिल की धड़कनें?
जब तुम अपनी आँखों से इतना ख्वाब दिखाते हो.
परमीत सिंह धुरंधर
बड़ी ख़ामोशी से मुस्कराने लगे हो
क्या है जो छुप के आने -जाने लगे हो?
मैं तो तन्हा ही हूँ जिंदगी में
मगर तुम क्यों?
खुद को बस आईने तक रखने लगे हो.
सुना है की सखियाँ भी अब बस इंतजार कर रहीं हैं.
सुना है की तुम उनसे भी खुद को छुपाने लगे हो.
मैं तो अकेला ही हूँ जिंदगी में
मगर तुम क्यों?
मगर तुम क्यों?
खुद को तन्हाइयों में रखने लगे हो.
परमीत सिंह धुरंधर
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
ये करुक्षेत्र है तुम्हारा
अब शंखनाद करो, वत्स।
क्या है यहाँ तुम्हारा?
क्या है पराया?
मोह का त्याग कर
परमार्थ करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
जो आज है
वो कल मिट जाएगा।
कल जो आएगा
वो तुम्हे मिटा के जाएगा।
अतः कल के फल की चिंता
किये बगैर तीरों का संधान करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
नस – नस में उनके एक अग्नि
सी जल जाए.
ह्रदय में उनके पुनः मिलन
की आस रह जाए.
शिव सा कालजयी होकर
काम का संहार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
अद्भुत दृश्य होगा
रक्तरंजित कुरुक्षेत्र होगा।
धरती से आकाश तक
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गवाह होगा।
हो एक – एक इंच उनका
तुम्हारी गिरफ्त में.
पाने शौर्य का ऐसे विस्तार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
कब सृष्टि रुकी है?
किसी के लिए.
कब वक्त को किसी ने
बाँध लिया है खुद के लिए?
तुम नहीं तो कोई और
बनाएगा उन्हें अपना, जीत कर.
तुम बस एक साधन हो
इस लक्ष्य प्राप्ति का.
प्राप्त मौके को गवा कर
जीवन को ना बेकार करो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
परमीत सिंह धुरंधर
भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार,
नस – नस में था जो व्याप्त।
कण – कण तक था,
जिसका विस्तार।
मन – मस्तिक,
आस्तिक – नास्तिक,
नर – नारी
पूरब – पश्चिम, उतर – दक्षिण,
सभी वर्ग, सभी धर्म,
भारत के थें,
इससे आक्रांत और बीमार।
इसका रूप नहीं था,
इसका रंग नहीं था,
पर था,
जो सर्वव्यापी और निराकार।
भारतियों ने ही जिसे निर्मित किया,
आज जो भारतियों को ही था दंश रहा।
गरीब – कमजोर, असहाय, बेरोजगारों,
पे जो नित – प्रतिक्षण कर रहा था,
अट्ठहास ले – ले कर के प्रहार।
ऐसे वातावरण में,
जब सभी हतास थें, जब सभी निराश थें।
डूब चुकी थी, भ्रष्ट आचरण में,
जब अपनी ही सरकार, और अपने ही कर्णधार।
जब मुस्करा रहा था, बढ़ रहा था,
दंश रहा था, भ्रष्टाचार का वो राक्षस,
हर भारतीय को, लेकर सुरसा सा आकार।
जब असंभव लग रहा था,
रोकना उसे, बांधना उसे,
अनुशासित करना उसे।
जब बुद्धिजीवियों ने उसे अमर कहा,
कहा “वो अपने जीवन का अभिन्न अंग है.”
अतः वो मिट नहीं सकता,
ना ही रुक सकता है उसका प्रसार।
तब ८ नवम्बर, २०१६, को पहली बार,
वो राक्षस, भय से आक्रांत हुआ।
अंधकार के उस प्रहरी पे,
अंधकार में ही प्रहार हुआ।
काश्मीर से कन्या कुमारी,
कच्छ से बंगाल तक,
एक नए सूर्योदय का,
हर आँगन में, हर जन को, आभास हुआ।
क्या अमीर? क्या गरीब?
औरत – मर्द, बच्चे – बूढ़े,
सब ने अपने ठंढे रुधिर में,
नयी उष्मा – ऊर्जा का आभास किया।
भारत के कोने – कोने से,
जन – जन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ,
भारत के प्रधानमंत्री के अव्वाहन पे,
इस युद्ध में शंखनाद किया।
एक रणभेरी बजी, एक ऐसी हुंकार उठी,
की धरती से आकाश तक,
हर भ्रष्ट मन आक्रांत हुआ।
वो छुपने लगें, वो भागने लगें,
रेंग – रेंग कर कराह उठें।
काले धन के विरुद्ध, इस धर्मयुद्ध में,
जनता ने जब कष्ट सह कर,
मुस्करा कर, अपने सुखों का त्याग किया।
वो मूर्क्षित हैं, विस्मित हैं,
दिग्भ्रमित हैं, चिंतित है,
खुद को बचाने के लिए,
अपने काले धन को समेटने – सहेजने के लिए।
मगर हम भी सचेत हैं, युद्धरत हैं, प्रयासरत हैं,
भ्रष्टाचार और काले धन को,
पूर्ण रूप से मिटाने के लिए।
और अपने भारतवर्ष को,
सुगन्धित – सुसज्जित – सुविकसित बनाने के लिए।
तो आवों मेरे देश-प्रेमियों,
इस मशाल को जलाएँ रखें,
इस त्यौहार को मनाते रहें।
और प्रण करें,
ना भ्रष्ट बनेंगे, ना भ्रष्टाचार सहेंगें।
ना काला धन सहेजेंगे, ना समेटेंगे।
ना खाएंगे और ना काला धन खाने देंगे।
अपने अंतिम साँसों तक,
अपने भारत को स्वच्छ रखेंगे,
आँगन में, उपवन में, तन से, मन से,
भ्रष्ट आचरण और काले धन से।
परमीत सिंह धुरंधर
वो सैयां जी
तानी करा ना दी गवनवा
जोबनवा बेकार होता।
भौजी रोजे दे तारी उल्हनवा
जोबनवा बेकार होता।
मन हमरो करSता
की धोई राउर बर्तनवा।
जोबनवा बेकार होता।
दरजी बढ़ावता बजनवा
जोबनवा बेकार होता।
बिन निंदिया भइलन नयनवा
जोबनवा बेकार होता।
सींचSता रोजे हमके परधानवा
जोबनवा बेकार होता।
अब का करबा बुढ़ापा में जतनवा
जोबनवा बेकार होता।
ना भैया के चिंता, ना बा बाबुल के फिकरवा
जोबनवा बेकार होता।
दुगो फूल त खिला ल अंगनवा
जोबनवा बेकार होता।
तनी रखी कभी हमरो मनवा
जोबनवा बेकार होता।
की अँटकल बा रउरे में प्राणवा
जोबनवा बेकार होता।
वो सैयां जी
तानी करा ना दी गवनवा
जोबनवा बेकार होता।
परमीत सिंह धुरंधर
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।
नयनों को लड़ाते
अधरों को चूमते
ग्रीवा से होकर
अपने गर्व का
वक्षों पे हुँकार भरो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।
ये चाँद भी तुम्हारा
ये निशा भी तुम्हारी।
उषा के आगमन तक
तनिक भी न
विश्राम करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।
ये वक्त भी तुम्हारा,
ये पथ भी तुम्हारा।
उनके शर्म को
उन्ही की वेणी से बांधकर
उन्ही के वक्षों पे
संहार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।
ना भय में बंधो
ना भविष्य की सोचो
की वो वफ़ा करेगी
या बेवफा निकलेगी।
बस अपने कर्म पथ पर
अडिग हो कर
उनके नस – नस में उन्माद भरो, वत्स।
विशाल वक्षों पे
प्रहार करो, वत्स।
उनके उमरते-मचलते
विलखते-पिघलते
कसमसाते विशाल देह को
अपने प्रचंड, बलिष्ठ
भुजाओं में दबोच कर
अनंत समय तक
प्यार करो, वत्स।
विशाल वक्षो पे
प्रहार करो, वत्स।
परमीत सिंह धुरंधर
अनंत है जो
वो शिव है.
विराज है कैलाश पे
पर समस्त ब्रह्माण्ड
अधीन है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.
योगी है, वैरागी है
भूत-भभूत, भुजंगधारी है.
गरल को तरल कर दे
सरल-ह्रदय, प्रचंडकारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.
काल को स्थिर करे
प्रचंड को सूक्ष्म करे.
नग्न-धरंग, अवघड़-अलमस्त
जटाधारी है.
सर्वस्व का त्याग कर
सर्वस्व का स्वामी है.
परमीत सिंह धुरंधर