प्रेम में कई घायल हुए,
और कई शायर नामी।
मगर वो है सबसे अलग, सबसे जुदा
वो है हासिम फिरोजाबादी।
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम में कई घायल हुए,
और कई शायर नामी।
मगर वो है सबसे अलग, सबसे जुदा
वो है हासिम फिरोजाबादी।
परमीत सिंह धुरंधर
लड़की वो थी केरला की,
कर गयी हमसे चालाकी।
आँखों से पिलाया हमको,
और बाँध गयी फिर राखी।
लड़की वो थी पंजाब की,
पूरी – की – पूरी शहद में लिपटी।
बड़े – बड़े सपने दिखलायें,
और फिर बोल गयी हमें भैया जी.
लड़की वो थी बंगाल की,
कमर तक झुलाती थी चोटी।
शरतचंद्र के सारे उपन्यास पढ़ गई,
सर रख के मेरे काँधे पे.
और आखिरी पन्ने पे बोली,
तय हो गयी है उसकी शादी जी.
लड़की वो थी हरियाना की,
चुस्त – मुस्त और छरहरी सी.
हाथों से खिलाती थी,
बोलके मुझको बेबी – बेबी,
और बना लिया किसी और को,
अपना हब्बी जी.
लड़की वो थी दिल्ली की,
बिलकुल कड़क सर्दी सी.
लेकर मुझसे कंगन और झुमका,
बस छोड़ गयी मेरे नाम एक चिठ्ठी जी.
परमीत सिंह धुरंधर
एक शाम तो ऐसी मिलो,
जब तुममे वफ़ा हो.
एक धागा तो ऐसी बांधों,
जब तुम्हारा मन सच्चा हो.
क्या देखती हो चाँद को?
छलनी से.
और मांगती हो सात जन्मों,
का रिस्ता।
अरे एक जन्म तो पहले,
सही से, किसी का साथ निभा दो.
परमीत सिंह धुरंधर
हर कोई ताजमहल बना रहा है,
अपने महबूब के लिए.
और फिर तलाक भी लिख रहा है,
अपने दूसरी मुमताज के लिए.
मैं वो शख्श नहीं जो समझौते करूँ,
मैंने कलम उठा ली है एक बगावत के लिए.
क्या सम्मान, क्या अपमान?
है सब सामान।
मेरी लालसा नहीं किसी तख्तो-ताज के लिए.
जवानी का मेरे ये उद्देश्य नहीं,
की राते गुजरे किसी खासम-खास के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर
इंसानियत में फ़र्ज़ रखता हूँ,
गुनाहों में सब्र रखता हूँ.
वो जो हँसते हैं मुझपे,
बस उनकी ख़ुशी के लिए,
ये एक दर्द रखता हूँ.
हुस्न को देख लिया है इतने करीब से,
की अब इश्क़ में मौन रखता हूँ.
वो चाहे जितने भी लिख लें,
सीता – सावित्री के किस्से।
मैं केवल मेनका – ये एक शब्द लिखता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम मुझसे शहर का रास्ता पूछते हो,
मैं तो खुद भटक रहा हूँ,
और तुम मुझे सफल बताते हो.
तो सुनो कह रहा हूँ,
की मेरी माँ कहीं है, और मैं कहीं हूँ,
और तुम मेरे परिवार का हाल पूछते हो.
परमीत सिंह धुरंधर
गावं के वो बगीचे आम के,
जिसपे बंदरों के झुण्ड खेलते।
गांव के सड़कों पे अनगिनत कुत्ते,
अँधेरी रातों में दौड़ते और भोंकते।
वो बैल नाद पे, वो गाय बथान में,
वो घूर, वो अलाव तापते।
वो थोड़ी सी आग, आँगन से मांगते,
वो रहर का खेत, जिसे हम अगोरते।
वो लड़कियों का समूह में,
बलखाते, खिसियाते, हँसते, और झेंपते।
वो शादियों में लड़कियों को टापते,
वो उनके दुप्पटे को अपने नाड़े से बांधते।
मेरी गालों पे हल्दी – दही का लगाना,
और हम उनपे सब्जी के छींटे उड़ाते।
वो नहर पे, बगीचे में दुपहर के,
वो चक्की पे आंटे के, घोनसार में उनसे सटते,
उनसे चिपकते।
आते – जाते राहों में, उनको हाले – दिल सुनाते।
सुना है, अब गांव भी बदल गया है,
ये सब अब एक गुजरा कल हो गया है.
अब दोपहर हो या शाम,
व्हाट्सप से लोग हैं दिलों को जोड़ते।
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी में अकेला पड़ गया हूँ,
तन्हाई में तन्हा पड़ गया हूँ.
दोस्तों के नाम पे बस,
एक घड़ी ही रह गयी है साथ में.
जिसके अलार्म को मैं अनसुना करने लगा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
अश्कों के ढेर के नीचे,
हूँ मैं दबा हुआ.
किसी ने आग लगाने की कोसिस की,
और उसकी सारी तीलियाँ बेकार गयीं।
इस कदर दिल टुटा है मेरा,
की दोस्तों की दुआएं और सारी दवाएं,
सब बेकार गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
चूसअता खून हमार अंग – अंग से,
पोरे – पोरे देता इ दाग रजऊ.
पूरा होत नइखे निंदिया कहियों हमार,
टूट जाता रोजे कच्चे ख्वाब रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
अइसे मत काटअ जवानी विरह में,
मिलल बा इ जीवन बड़ा ख़ास रजऊ.
कब तक रहेम सन बन के चाचा – चाची,
पलना में दे दीं एकठो लाल रजऊ.
ना त बुढ़ापा में हो जाएम टुअर – टॉपर,
छोड़ दीं इ सत्ता और ताज रजऊ.
रखलीं हमारा के रतिया में पास रजऊ,
की खटमल बन गइल बा इ खाट रजऊ.
परमीत सिंह धुरंधर