जब तक ना उतरेगी मेनका


सारा – शहर है मेरी नजर पे फ़िदा,
तुम कैसे बचोगे, कब तक ?
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
ना पिघलूंगा, जब तक ना उतरेगी मेनका।

पत्थर बनके कहीं मिट ना जाओ,
चख लो समंदर का अमृत ज़रा.
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
रचूंगा नया सवर्ग अपना।

ढल जाएगा यौवन, तो हाथ मलना पडेगा,
देख – देख के छलकता गागार यहाँ।
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
अनंत तक चमकूंगा बांके सितारा।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्ष अध्यात्म का प्रथम और आखिरी पाठ हैं


वक्षों पे ही मोक्ष है,
जो प्राप्त कर ले इन्हे,
वो ही वशिष्ठ और अगस्त्य है.
यूँ ही भीष्म ने नहीं रोक लिया था,
अपने तीरों को,
जो वीर हैं, वो उठाते नहीं,
इनपे तीर और तलवार हैं.

जलवाई को नियंत्रित करते,
इस भीषण – प्रचंड शीतलहर में,
ये ही हैं जो धमनियों को निरंतर,
रखते हैं जागृत और उनमे,
रक्त को करते संचारित।
कामुकता नहीं, अध्यात्म का,
बस यही प्रथम और आखिरी पाठ हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे ही मोक्ष है


व्याकुल मन को शांत कर दे,
चित को कर दे एकाग्र।
योग – माया क्या है ये जीवन?
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं मोक्ष – अमृत – परमानंद का भण्डार।

हिमालय सा उन्नत ये,
सुसुप्त अवस्था में भी रखते हैं,
समुन्द्र सा ज्वार।
अपूर्व – अन्नत इस ब्रह्माण्ड में,
ये वक्ष ही करते हैं जीवन का संचार।
वक्ष ये केवल वक्ष नहीं हैं,
ये हैं वीरों का अभिमान।

 

परमीत सिंह धुरंधर

पर मोदी जी


पीया हो गइलन परदेश के गुलाम हो,
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.
कट त जाला जेठ और आषाढ़,
पर मोदी जी अकेले ना कटे इ माघ हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

दुआरा – अंगना, खेत – खलिहान,
हम सब कर लेवेनि।
सास – ससुर, गाय – बैल,
हम सब देख लेवेनि।
पर मोदी जी सेजिया के चोट ना सहात हो.
तनी मोदी जी गांव के भी करि विकास हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अंग-अंग से तुम मचली हो


एक हाथ की दूरी हो,
साँसों से मेरे तुम महकी हो.
दरिया बनके मुझे डुबोने को,
अंग-अंग से तुम मचली हो.

क्या शर्म और हया?
कुल – मर्यादा सब भूल कर,
यौवन की मदिरा में बहकी हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब सिंह के साथ सहवास कर लो


अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो,
इस शीतलहर में, उसके नस – नस में,
प्रचंड अग्नि-कुंड जागृत कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

वो उबल – उबल, दहक – धधक,
बिखरे तुम्हारे अंगों पे,
अपने सुगढ़ – सुडौल वक्षो पे,
ऐसा उसे विश्राम दे दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

भ्रमर के पीछे कब तक भागोगी,
अब सिंह के साथ सहवास कर लो.
देख ले सारा हिन्द इस सत्ता को,
सहचर बनकर ऐसा शंखनाद कर दो.
अपना कौमार्य दे कर उसे गजराज कर दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे


प्रभु आप जब से जीवन को साकार कर रहे,
रोम – रोम से गजानन हम आपका गुणगान कर रहे.
चक्षुओं को भले प्रभु आपका दर्शन ना मिला हो,
हम साक्षात् ह्रदय से परमानंद का आभास कर रहे.

अद्भुत है आपका अलंकार देवों में,
स्वयं महादेव भी ये बखान कर रहे.
लाड है, प्यार है माँ पार्वती को आपसे,
जग में शक्ति को प्रभु आप स्वयं सम्पूर्ण कर रहे.

मैं भिखारी हूँ, भिक्षुक हूँ दर का प्रभु आपके,
कृपा है प्रभु आप मुझपे नजर रख रहे.
आपके चरण-कमलों में हो मस्तक मेरा भी,
बस इसलिए प्रभु हम आपका नाम जप रहे.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अपने कौमार्य को दे कर उसे गजराज कर दो – 2


अपने कौमार्य को दे कर उसे गजराज कर दो,
स्वयं बन कर मेनका उसे इंद्रा का ताज दे दो.
वो हुंकार करे, हर बार करे,
तुम शांत चित हो कर,
अपने यौवन की वीणा को,
उसकी अँगुलियों से झंकृत कर दो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

लकीरों का जोर


मोहब्बत ने हर तरफ दे अधूरा कर दिया,
जिस शहर के हम शहंशाह थे,
उसी की गलियों में रुस्वा कर गई।
क्या पीना और पिलाना दोस्त,
मेरे हाथ की लकीरों का जोर देख,
दूसरों को दिया तो दवा,
और खुद पे जहर का काम कर गई.

 

परमीत सिंह धुरंधर

फर्क रखो


उजालों और अंधेरों में कुछ तो फर्क रखो,
कोई हुस्न नहीं हो,
की दिया बुझा के शर्म उतार दूँ.
मैं चुप हूँ तो इसे मेरी मज़बूरी ना समझ,
जख्म बिस्तर के नहीं ये,
जो दिवाली माने लगूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर