तो मेरा चाँद निकले


वो जो अपनी जुल्फों में हैं रात को समेटे
गेसुओं को खोल दें तो मेरा चाँद निकले।
वो जो हया में अपने बंध के मंद-मंद मुस्करा रहे हैं
ये पर्दा हटा दें तो मेरा चाँद निकले।
हजारों आड़ावों से भरी है उनकी खिली जवानी
जरा जाम छलका दें तो मेरा चाँद निकले।

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दर्द


मेरा दर्द मेरी राहों का काटा बन रहा
प्यास मेरी मंजिल को धुंधला कर रहा.
आँखे इस कदर चौंधियाने लगी हैं
की ये शहर मुझे मेरे गावं से अलग कर रहा.
शोहरत की चाहत पगडंडियों पे चलके
तो मिलती नहीं।
और इनके सड़कों पे भागते मेरे पाँव
और ये थकान, मुझे मेरे ख्वाबों से दूर कर रहा.

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दिल को जलाकर


दिल को जलाकर पिए जा रहे हैं
बचा अब ना कुछ भी, पर जिए जा रहे हैं.
किसको पुकारे, कौन है यहाँ अपना
मुख को हाँ मोड़ें हाँ सभी जा रहे हैं.

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हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई जाने कहाँ लड़ाई आँख.
मैं बदली तेरे लिए और बदलती ही जा रही हूँ
फिर भी ना तू समझे मेरे मन की कोई बात.
हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई ज्जाने कहाँ लड़ाई आँख.

तुम्हारे पाँव को मैंने माना अपना संसार
पर तू भी मर्द वो ही जिसे भये बस बाजार।
मेरी प्रेम-क्षुधा को ठुकराकर
जाने ढूंढ रहा हैं किन गलियों में तू प्यार।
हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई जाने कहाँ लड़ाई आँख.

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पन्ना


तुम अगर मिल जाते मुझे तो मैं तुम्हारा बन जाता
तुम मेरा चाँद मैं तुम्हारा सितारा बन जाता।
तुम सुबह की छिटकती धुप सी, मैं आँगन बन जाता।
तुम दरिया और मैं तुम्हारा समंदर बन जाता।

पर अब जब तुम नहीं मिली
तो मैं रह गया एक मुसाफिर बन कर
भटकता हुआ.
एक सितारा टुटा हुआ.
किताब का वो पन्ना
जिसपर कभी कुछ लिखा ही नहीं गया.
तुम अगर मिल जाती तो मैं पूरा किताब बन जाता।
पर अब जब तुम नहीं मिली
तो मैं रह गया बनके किताब का वो आखिरी पन्ना
जिस पर कुछ लिखा ही नहीं गया.

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इसी कश्मकश में रहा


उलझने सुलझाऊँ या जिंदगी बसाऊं, इसी कश्मकश में रहा.
उनको मनाऊं या खुद से ही रूठ जाऊं, इसी कश्मकश में रहा.
हालत कुछ यूँ बदल गए, की खुद को बदलूँ या हालात बदलूँ, इसी कश्मकश में रहा.

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मेरी कोशिश


आसान बन जाती है जिंदगी तेरे मुस्कुराने से
और मेरी कोशिश है की तू मुस्कराये।
पर बहुत काँटे हैं मेरी दामन में
और डर है की एक भी तुम्हे न लग जाए.

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टुटा और टूट कर बिखर गया


इशारों-इशारों में उसने बता दिया
कुछ भी नहीं मिला उससे घर बसाकर।
मैं टुटा और टूट कर बिखर गया
वो भी तन्हा रही सेज को सजाकर।

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जवानी


तेरी जवानी का जब भी चर्चा चला
मयखानों में मेरा नाम चला.
तेरी हसरतों को पाले हुए सब जावाँ
उन्हें मेरे हस्र का पता चला.

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जी-हजूरी


अभी रात का सफर है, दिन की क्या आरजू करें
खंडहरों में रहने वाले किसी से क्या गुफ्तुगू करें?
ख्वाब भी नहीं आते, इस कदर मुफलिसी है
जिंदगी को अब और कैसे बेआबरू करें।
मिला ना ऐसे कोई की करें दिल के हालत बयान
सभी की हसरतें थी की हम बस जी-हजूरी करें।

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