पर्वतों के शिखर पे बादलों का तांडव है,
सागर की लहरों पे हवाओं का बर्चस्व है.
बस एक दिया ही है,
जो जल उठता है अँधेरा मिटाने को.
चाहे आँधियों कैसा भी दौर हो.
परमीत सिंह धुरंधर
पर्वतों के शिखर पे बादलों का तांडव है,
सागर की लहरों पे हवाओं का बर्चस्व है.
बस एक दिया ही है,
जो जल उठता है अँधेरा मिटाने को.
चाहे आँधियों कैसा भी दौर हो.
परमीत सिंह धुरंधर
उदास मन,
निराश हो जाता है,
कितनी जल्दी।
मैं भूल नहीं पाता,
उन काँटों को,
जिन्होंने मुझे रुलाया चुभकर.
जवानी की दहलीज़ पे,
तूने एहसास कराया खूबसूरती का.
मगर फिर तूने,
ऐसे तोडा भी इस दिल को,
आज तक उम्मीदों का दामन,
मैंने फिर पकड़ा नहीं।
दिल टूट जाने के बाद,
दिए कितने भी जला लो दिवाली के,
रौशनी नहीं मिलती।
सफलता के हर मोड़ पे,
एक दर्द आ ही जाता है.
वो असफलता और उसका दंश,
किसी सफलता से नहीं मिटती।
मैं कहीं भी छुप लूँ,
किसी के आगोस में.
वो नशा, वो सुकून,
अब कहाँ।
सच कहाँ है किसी ने,
दर्पण के टूटने से अपना ही,
अक्स विखंडित हो जाता है.
परमीत सिंह धुरंधर
शीशम के दस गाछ लगा दूँ,
दो बैल बाँध दूँ नाद पे.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
रधुकुल में भगीरत हुए,
गंगा को धरती पे लाने को.
जैसे भीष्म हुए बस,
गंगापुत्र कहलाने को.
मैं भी धरा पे एक धारा बहा दूँ,
जो सींचते रहे मेरी गुलशन को.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
मेरा लक्ष्य नहीं जो,
साधित हो आसानी से.
वो भी नहीं जिसके पथ के,
असंख्य गामी हो.
पुत्र ही हूँ धुरंधर का,
हर क्षण -क्षण में एक कुरुक्षेत्र है.
पहले विष तो पी लूँ शिव सा,
जग को जीवन -अमृत दे के.
तब बैठूंगा दोस्तों,
शादी के पंडाल में.
परमीत सिंह धुरंधर
समुद्र की उठती लहरे,
भी क्रंदन से कम्पित हैं,
दूसरों का लक्ष्य मिटाती ये,
खुद अपने लक्ष्य से भ्रमित हैं.
भयंकर गर्जना करती,
हृदय में सबके,
भय को प्रवाहित करती ये,
स्वयम ही भय से ग्रसित हैं.
यह बिडम्बना हैं,
या समय का प्रवाह,
अथाह, अपार,
सम्पदा से सुशोभित ये,
मूर्खों की संगती में उत्तेजित हैं.
अहंकार है यह,
या चक्छुवों का,
सूर्य -प्रकाश में निर्बल होना,
या भाग्य ही हैं,
इन विशाल- बलवान लहरों का,
चाहे राम के बाण हो, या कृष्णा के पग
हर जनम में मानव से, ये पराजित है.
परमीत सिंह धुरंधर
रातों को ढल जाने दो,
सुबह को सीने में पल जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरे तन पे ये धूप गिर जाने दो.
तुम मेरी कमर जब पकड़ते हो,
मैं कैसे फिर सोऊँ?
तुम्हारी उँगलियों के रहते मेरी जुल्फों में,
मैं कैसे अपनी आँखों में नींद लाऊं?
तुम ये रातों का दीप, पूरा जल जाने दो,
ये चाँद -तारे, उषा के आँचल में छुप जाने दो.
दोपहर में,
मैं मिलूंगी तुमसे बलम जी,
मेरी वक्षों पे भी थोड़ी ये धूप गिर जाने दो.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी में बहुत गम है,
कभी तुम मुस्कराओ, कभी हम मुस्करा लें.
माना की हम जीवन भर साथ नहीं रह सकते,
माना की हम जीवन भर साथ चल नहीं सकते।
पर कुछ और नहीं,
आवो कभी, इन ठंढी रातों में,
कॉफी की एक चुस्की ही साथ ले लें.
जिंदगी में बहुत काम है,
कभी तुम हाल पूछ लो मेरा, कभी हम तुम्हारा हाल पूछ लें.
परमीत सिंह धुरंधर
तुमसे इश्क़ हुआ तो ज़माने को समझने लगे.
तुम्हारे पीछे है अब जमाना, मुझे लगाने को ठिकाने।
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम वही जिसमे मिलान हो,
विछोह तो गाय से बछड़े का होता है.
अभी मुख से स्तन छूट भी नहीं,
और खूंटे से इनको बंधन होता है.
प्रेम, वही, जिसमे ओठों से रसपान हो,
विछोह में तो मीरा को विषपान होता है.
अभी विरह में ह्रदय जी भर के रोया भी नहीं,
और मीरा को जग से जाना पड़ता है.
परमीत सिंह धुरंधर
समुन्द्रों को बचा के रखो अपने,
इश्क़ में सबको रोना होता है.
परमीत सिंह धुरंधर
कलम आपको वो समय देखने को शक्ति देती है, जो आप लाना चाहते हो. लेकिन आप विवस हो और नहीं ला सकते। कलम, आपको अपनी असफलताओं को छुपाने का माध्यम है. दुनिया के सबसे असफल आदमी की कलम ज्यादा मुखर होती है. ये पंक्तियाँ, उन लड़कियों और महिलाओं के लिए समर्पित है जिन्हें ३१ दिसम्बर २०१६ को बंगलोरे में शारीरिक उत्पीरण का सामना करना पड़ा. कुछ लोग बस जीवन में सिर्फ लड़कियों को पाना चाहते हैं. और मैं वो समय लाना चाहता हूँ जब कोई भी लड़की कैसे भी अपनी मर्जी से जीये और जी सके.
काले – काले मन के,
पहले भ्रम को,
कैसे तोड़ दूँ मैं?
मैं नहीं रखूंगी अम्मा,
चुनर अपने बक्षों पे.
गली-गली में गुजरती हूँ जब,
खुल जाते हैं, सब खिड़की-दरवाजे।
मेरी चाल पे बजाते हैं,
सीटी, बच्चों से बूढ़े।
अपनी नयी – नयी जावानी को,
नहीं ढकूँगी अम्मा, रखके,
चुनर अपने बक्षों पे.
परमीत सिंह धुरंधर