भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं


सोचती हूँ उम्र तुम्हारी बाहों में गुजार दूँ
पर डरती हूँ कहीं एक पत्थर ना बन जाऊं।
मैं भी देखती हूँ तुम्हे
तिरछी नज़रों से
पहचान लेती हूँ तुम्हे दूर से ही
तुम्हारे मुख, सीना, कन्धों
और टांगों की परछाई से
अच्छे लगते हैं तुम्हारे कहे
छेड़खानी के वो गंदे – शब्द
थक -हारकर सोचती हूँ
तुम्हारा घर बसा दूँ
पर डरती हूँ कही मैं ही अपने पंख न खो दूँ.
सीता जैसी सती से जब ली गई अग्नि-परीक्षा
द्रौपदी जैसी वधु को
जब समझा गया चौरस का एक पासा
सोचती हूँ इन सबसे गुजर जाऊं
तुम्हारे एक छुअन के लिए
पर डरती हूँ कहीं भीष्म सा तुमसे ठुकराई ना जाऊं।

परमीत सिंह धुरंधर

टकटकी


पतली कमर और डगर पतली
कैसे संभालोगी अपनी गगरी?
रखवार मेरा है छपरा का धुरन्धर
तुझ जैसे बिलाड़ लगाएंगे बस टकटकी।

परमीत सिंह धुरंधर

काली – काली सी हीर


तू काली – काली सी
पर लगती है कोई हीर.
कभी अकेले में मुझसे मिल
संग लगाएंगे कचहरी।

जितना तुझे देखता हूँ
उतनी तू भा रही.
ये नशा है मेरा
या तेरी जादूगरी।

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे सागर लहरा गया


ना दौड़ा करों यूँ उछल – उछल के
की वक्षों पे सागर लहरा गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.

अभी -अभी तो चढ़ी जवानी
अभी से मौसम बदल गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.

परमीत सिंह धुरंधर

मैं लौटूँगा


तू न मिली इस जीवन में, अगले जीवन का क्या पता?
दर्द बहुत है, पर प्रिये तुझे पाने के लिए, मैं लौटूँगा।

परमीत सिंह धुरंधर

घूँघट का दौर


कब तक बहलाओगी किताबों से खुद को?
वो बचपन का दौर था, ये जवानी का दौर है.

आँखों के शर्म को पलकों पे रहने दो
वो घूँघट का दौर था, ये निगाहों का दौर है.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की मिट्टी


जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.

जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.

दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.

जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.

हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.

छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

किस्मत


वो मोहब्बत की बातें, वो शरारत की रातें
खुदा जानता है, हमें आज भी हो तुम याद.

गुनाहों में साथ थे, पनाहों में साथ थे
बस किस्मत में ही नहीं लिखा था साथ.

तुम जाने कैसे जीने लगे हमसे दूर होकर
हमें तो साँसें भी लगती हैं अब दुश्वार।

ये निगाहें अब भी तुम्हे ढूंढती हैं
और कब तक तुम्हे देते रहें आवाज।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जब गुजरता हूँ शहर के करीब से
तो बहुत याद आती हैं वो खाटों की लोरियाँ।

मैं तन्हा ही रह गया शहर में घुल के
इनसे अच्छी तो थी वो चुभती बालियाँ।

कौन कहता हैं की जिंदगी खुद की हाथों से संवरती हैं?
मैं भी जानने लगा हूँ कौन खींचता हैं ये डोरियाँ?

परमीत सिंह धुरंधर

घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम


पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे भोले-भाले
और मैं चतुर दुल्हन।
देखेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

घोड़ा दौड़े सरपट – सरपट
ठंठी – मीठी बहे रे पवन.
घूमेंगे नगरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे गोरे -गोरे
आ काले – काले हम.
देखेंगें शहरिया बजाके प्याल छम-छम.

मेरे एक नजर पे
बहके उनके हर कदम.
देखेंगें नगरिया बनके हमदम।

नैन मेरे चंचल
और मैं नटखट।
घूमेंगे नगरिया उठाके घूँघट।

पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

The poem is written for the Cabriolet which was once cultural part of Bihar. I have memories still fresh in mind. I had enjoyed it whenever I went to Katihar during my childhood.

परमीत सिंह धुरंधर