तू भी है राणा का बंसज


तू भी है
राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक
भाला जाए.
जीत – हार तो
श्रीकृष्ण के हाथ है
कब तक जीवन यूँ जीया जाए?

अश्वों को थाम के
उतर जा कुरुक्षेत्र में
कब तक भोग -विलास में
समय बिताया जाए?
माना की तेरे नसीब में
यौवन का सुख नहीं
तू ही बता फिर धरती पे
किसे महाराणा बुलाया जाए?

गर नहीं विश्वास
तुझे ही लहू का
तो फिर कितना तुम्हे?
इतिहास पढ़ाया जाए.
सब हैं अमृत के प्यासे
किसकी प्यास गरल से बुझाई जाए?

प्रचंड-प्रबल वेग से गंगा
आतुर है सृष्टि को मिटाने को
काल को जो बाँध ले
उस महाकाल को क्यों न पुकारा जाए?
जीवन उसी का सार्थक है जग में
युगो -युगो तक जिसका नाम गाया जाए.

परमीत सिंह धुरंधर

First two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.

एक शिकायत है


नजर है, नजाकत है
अदा में अदावत है.

कमर है, क़यामत है
खुदा की इनायात है.

ना रखा करो यूँ पर्दा
बस ये ही तो एक शिकायत है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये शहर है दोस्तों


दौलत की चमक किसे नहीं भाती?
ये शहर है दोस्तों, यहाँ रोशनी नहीं आती.
रिश्तों की राहें तो बहुत हैं यहाँ
मगर कोई राह दिल तक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव तुम कहाँ हो-2?


सत्ता के जो लोभी हैं
उनका कोई रिश्ता नहीं।
जो लिख गए हैं कलम से
वो कोई इतिहास तो नहीं।

तुम क्या संभालोगे मुझे?
जब तुम्हारे कदम सँभालते ही नहीं।
तुम्हारा मुकाम अगर दौलत है तो
मेरी राहें वहाँ से गुजरती ही नहीं।

जमाना लिखेगा तुम्हे वफादार
पर हुस्न, जवानी में वफादार तो नहीं।
कुछ किस्से चलेंगे मेरे भी
पर उनमे आएगा तुम्हारा जिक्र तो नहीं।

ये अधूरापन ही है अब बस मेरा जीवन
पूर्णता की तलाश और चाहत तो नहीं।
तुम मिल भी जाओ किसी शाम तो क्या?
उस शाम में होगी अब वैसी बात तो नहीं।

Dedicated to Punjabi Poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

कुछ किस्से


कुछ किस्से
वो कमर से लिख गयीं।
कुछ किस्से
वो नजर से लिख गयीं।

जब और लिखना
मुमकिन ना रहा.
वो अपने अधरों को
मेरे अधर पे रख गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

क्या मतलब?


जो सफर में है उसे शहर से क्या मतलब?
मुझे शौक तेरी अधरों का है, तेरी वफ़ा से क्या मतलब?

ला पिला दे तू हलाहल का प्याला
जब तू ही किस्मत में नहीं तो अंजाम से क्या मतलब?

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव तुम कहाँ हो?


भीड़ में बहती जो वो नीर तो नहीं
तन्हाई में सूखती वो पीर तो नहीं।

टूटते तारें आसमाँ के
कहीं उनका निशाँ तो नहीं।

व्याकुल मन जिसे पल – पल पुकारे
वसुंधरा पे वो कहीं तो नहीं।

इससे बड़ी पराजय क्या होगी?
जब जीत की कोई लालसा ही नहीं।

उतार दो तुम ही ये खंजर मेरे सीने में
इन धड़कनों को तुम्हारी वेवफाई पे यूँ यकीं तो नहीं।

मुझे नहीं पता ए शिव तुम कहाँ हो?
मगर कोई और नाम सूझता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

दाना डाल दूँ


रक्त के हर बून्द की तुम बन गयी हो प्यास
तुम मिलती हो तो लगता है वक्त भी ख़ास.
तो मत रहो यूँ दूर – दूर, शर्म में बंध कर
आवो, मैं बेशर्म बनके तुम्हारी बेड़िया तोड़ दूँ।

मौन हो तुम पर मैं जानता हूँ
तुम्हारे ख़्वाबों में भी उड़ते हैं कई पंक्षी
तुम कहो तो आज तुम्हारे पंक्षियों को
मैं भी थोड़ा अपना दाना डाल दूँ.

तुम्हारे मुख पे घूँघट और ये झुके नयन
कब से बन गए हैं ये तुम्हारे बंधन?
ये तो मुझको रिझाने के तुम्हारे श्रृंगार हैं
तुम कहो तो आज थोड़ा
तुम्हारे अंगों का मैं श्रृंगार करूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

नादानी पे है


हर किसी की नजर जवानी पे है
बस हम ही हैं सनम जो नादानी पे है.

सब हैं यहाँ दिल जीतने को तेरा
बस हम ही हैं सनम जो दिल हारने पे है.

दौलत – शोहरत, क्या नहीं?
ये तेरे दामन को चाँद -तारों से सजा देंगे।
बस हम ही हैं सनम जो तेरे नखरे उठाने पे हैं.

ना पूछा कर हमसे,
क्या कर सकते हैं तेरे लिए?
जहाँ से सब तेरा साथ छोड़ दे,
वहाँ से हम निभाने पे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर


रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.

वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.

परमीत सिंह धुरंधर