ह्रदय की तुम स्वामिनी
और मैं हूँ तुम्हारा पतंग।
कट – कट के मैं गिरूंगा
पर चूमूंगा तुम्हारे अंग.
चन्दन की तुम सुगन्धित बेल
और मैं हूँ तुम्हारा भुजंग।
विष को अपने मैं हरूँगा
लिपट के तुम्हारे संग.
परमीत सिंह धुरंधर
ह्रदय की तुम स्वामिनी
और मैं हूँ तुम्हारा पतंग।
कट – कट के मैं गिरूंगा
पर चूमूंगा तुम्हारे अंग.
चन्दन की तुम सुगन्धित बेल
और मैं हूँ तुम्हारा भुजंग।
विष को अपने मैं हरूँगा
लिपट के तुम्हारे संग.
परमीत सिंह धुरंधर
गहन – गहन अध्ययन करके भी
तुम्हारे सौंदर्य से मैं हार गया.
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे अधरों से पान करूँ?
वेद – पुराण पढ़ कर भी
मैं हृदय अपना ना साध पाया।
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे यौवन का रसपान करूँ?
परमीत सिंह धुरंधर
वीर कई धरती पे हुए
पर महराणा सा न कोई वीर हुआ.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
कोई नहीं था जो
टिक जाता खडग के आगे.
महाराणा ने जिस खडग को
अपने बाजुओं का बल दिया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
ना नरम बिछोना
ना मदिरा का पान किया।
कतरे – कतरे से लहू के अपने
हमने माँ का श्रृंगार किया।
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने देश के लिए घास खाया।
महराणा से Crassa तक
सबने है इतिहास रचा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
हमने प्रेम में सबका मान रखा.
हम राजपूतों की विरासत है ये
ना सर झुकाया, ना देश छोड़ा।
परमीत सिंह धुरंधर
इंसान तेरे क़दमों की बस यही एक कहानी
रुक जाएँ तो, कौन साथ इनका मांगता?
धुप में जो रूप खिले, ऐसा यौवन है वो
शीत के चाँद को कौन आँगन से है देखता?
परमीत सिंह धुरंधर
तुम करुणामयी भक्तवत्सल
तुम धर्म का आधार हो.
सर्वव्यापी, निरंतर, अचर-अगोचर तुम
तुम सनातन साकार हो.
मैं मुर्ख -अज्ञानी – पापी
मुझे क्षमा करो, मेरा उधार हो.
सृष्टि के आदिकर्ता, पालक – संहारक तुम
तुम ब्रह्म निराकार हो.
जीव – अजीव सब तुममे समाहित
तुम कण – कण में विराजमान हो.
परमीत सिंह धुरंधर
मन भी समर्पित, तन भी समर्पित
ए धरती तेरे लिए.
लौट के फिर से आया हूँ
माँ, तुझको ही सजाने के लिए.
ख्वाब मेरा है, अरमान मेरा है
कोना – कोना लहलहा दूँ फसल से
विश्वास रखो भारत के किसानों
मोदी खड़ा है सिर्फ तुम्हारे लिए.
साँसे हैं जबतक इस तन में
ख्याल रखूंगा जन – जन का.
लौटा हूँ आशीष लेकर
बाबा केदारनाथ जी से
हिन्द के वीर जवानों के लिए.
मन भी समर्पित, तन भी समर्पित
ए धरती तेरे लिए.
लौट के फिर से आया हूँ
माँ, तुझको ही सजाने के लिए.
परमीत सिंह धुरंधर
मुस्करा – मुस्करा कर वो किताब दे गयीं
कभर पे जिसके लिखा था फिजिक्स
अंदर वो अपना रुमाल दे गयीं।
परमीत सिंह धुरंधर
वो किताबों के मेरे पन्ने बने हैं
वो शहर की मेरी दुकानें बने हैं.
ढूंढती है जिसे नजर मेरी प्यासी
वो ख़्वाबों के मेरे समंदर बने हैं.
वो मासूम सा चेहरा
छोड़ गया मुझे भंवर में
जिसके लिए हम दीवाने बने हैं.
These lines are for someone from Raebareli.
परमीत सिंह धुरंधर
न व्यर्थ करो मेरे जीवन को
अपने गर्व के आवेश में
तुम दम्भ से ग्रसित गजराज हो
मैं शर्म से संकुचित तरुणी हूँ.
तुम यश – गाथा के लालसी
मैं अंक की तुम्हारे अभिलाषी हूँ.
ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
ना खेलो मेरे ह्रदय से
मैं कोमल – कुमुदुनी हूँ.
अपना बना लो मुझे
आतुर मैं प्रचंड अग्नि हूँ.
व्यर्थ न करो मेरे तन – मन को
मैं तुम्हारी जीवन – संगिनी हूँ.
क्या प्राप्त कर लो गे, गंगा-पुत्र?
इस प्रतिज्ञा को पाल कर.
भीष्म तो बन जाओगे
पर मैं तुम्हारी अधूरी – जिंदगी हूँ.
मेरी साँसों में प्रवाहित हो तुम
मैं ही तुम्हारी अर्धांगिनी हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर