जब भी मिलोगी तुम्हे जला के रख दूंगा
बारूद बिछा के दिल में सुलगा के रख दिया है.
जिसको भी हरा नहीं पाया मैं दिन के उजालों में
उसे रात के अंधेरों में काट के रख दिया है.
दिल की दुनिया में सिर्फ तेरा ही है साया
मैंने सरहदों को इस कदर बाँध दिया है.
ग़ालिब की बस्ती में तन्हा तो कोई नहीं हैं
टूटे दिल में मैंने दर्द को यूँ रख दिया है.
इतना भी ना तोड़ो, मैं मुस्करा ना हाँ सकूँ
एक मुस्कराने के लिए ही है तुझको छोड़ दिया है।

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चिंगारी


मैं लिख रहा हूँ तेरी जुल्फ पे किताब
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे रूप को शराब।
मैं लिखता हूँ तेरी आँखों को अपना अंतिम पड़ाव
मेरी कलम लिख देती हैं तेरे वक्षों पे विश्राम।
मैं लिखना चाहता हूँ तुझे चाँद और मेरा आसमान
मेरी कलम लिखती हैं तुझे मेरा गावं-मेरा बिहार.

तेरे जिस्म की अंगड़ाइयां तेरी आखों की गहराइयों पे भारी हैं
तू मिल जाए तो आग लग जाए, तू राख में दबी ऐसी चिंगारी है.

तू दिन भर की धुप के बाद की एक चाँद है
तू लिट्टी-चोखा पे आम की आचार है.
तू मिल जाए तो झूम उठे हर राही
तू सतत-अभियान का आखिरी पड़ाव है.

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किताबों में लिखा तेरा नाम है


ये पढ़ने वाले लोग यूँ ही नहीं परेशान है
की शहर की सभी किताबों में लिखा तेरा नाम है.
जुल्म की इंतहा क्या होगी
दिमाग से तेज लोगों का दिल तेरा गुलाम है.

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मंजिले उम्र भर का पड़ाव नहीं होती


वो अब एक चाय के लिए भी नहीं पूछते
जो कल तक मेरे घर आते बहुत थे.

भीड़ में अब भी खींचता है कोई
मंजिले उम्र भर का पड़ाव नहीं होती।
तुझे इश्क़ है दिल से तो दिल लगा
यहाँ जिस्म से भी रात गुलजार नहीं होती।
तूने तोडा है इस कदर मुझे की अब
किसी और से जुड़ने की कोई बात नहीं होती।
मिलेगा लिट्टी -चीखा तो बैठ जाएंगे खाने को
वरना जिस्म को अब थकन नहीं होती।

तेरे इंतज़ार में अब बस बेबसी है
मेरी तन्हाई का दर्द ये दुरी नहीं तेरी खामोशी है.

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किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है


किताबों में आज भी तस्वीरें बहुत है
इश्क़ में ये दिल टुटा बहुत है.
तुझे प्यास लगे तो लहू से भी मिटा देंगे
मेरी जिंदगी में प्यास बहुत है.
जिस्मानी सुखों का अंत नहीं
राहे-दिल में भी दुःख बहुत है.
मुस्कुराता नहीं हूँ, ये शिकायत है उन्हें
की इन लबों ने नमक पीया बहुत है.
जमाने की नजरों में पिछड़ा होगा बिहार
मगर उस जमीन पे खुशियां बहुत हैं.
यकीं ना हो तो घर बसा के देखो बिहारी का
वहाँ के ससुराल में सुकून बहुत है.
यूँ ही नहीं कहते हैं हमें बाबूसाहेब
छपरा-सीवान, पटना तक हमारा रोआब बहुत है.
हम अब भी ज़िंदा हैं उसे यकीन नहीं होता
इश्क़ में हमें जिसने रुलाया बहुत है.
हमें उतरा बीच हाइवे पे दोस्तों ने ही कार से
मगर बेचनेवालों को भी खुदा ने बनाया बहुत है.
हमने किसी को थमा नहीं उसके ठुकराने के बाद
उसने भी ज़माने को नचाया बहुत है.
उम्मीदों के समंदर में सब है बस वो नहीं
जिसके किनारों पे हमने घर बनाया बहुत है.
जिंदगी की तलाश में कुछ भी नहीं तरस पाएं
इस मुकाम पे भी ये मलाल बहुत है.

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बेवफा


नजर की ख्वाइशें नजर में रह गयी
जो दिल में दबी थी वो दिल में रह गयी.
हम पीते रह गए जिसकी याद में
वो सब मिटा के डोली चढ़ गयी.
कुछ भी नहीं इश्क़ में एक धोखा के सिवा
और बेवसी देखिये की बेवफा को कलम वफ़ा लिख गयी.

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मिला ना मुझको दर्द का वो हिस्सा जिंदगी


मिला ना मुझको दर्द का वो हिस्सा जिंदगी
ग़ालिब ने लिखी बैठ के जिसे सारी जिंदगी।

बहुत दिनों की अय्यासी ने बस एक खालीपन दिया
चार दीवारों के बीच तन्हाई और भीड़ में अकेलापन दिया।
वक्त रहते संभाल न सका मैं अपने पावों को
तो गुजरते वक्त ने बस एक सूनापन दिया।

खवाबों तक ही रह गयीं आपके लिए मेरी प्यास
निगाहें मिली, बरसात भी हुई, पर मिट ना सकी ये आग.
जा तुझे छोड़ रहा हूँ तेरी ही ख़ुशी के लिए
तू किसी की भी बाहों में झूले, पर ना मिलेगी मेरी बाहों की मिठास।

वो अपनी मोहब्बत के तारे गिन रहे हैं
और हम शहर में उनके सहारे जी रहें हैं.

भंवर-भाँवर में पंवर -पंवर के
चंवर – चाँवर में चहल -चहल के
देख लेहनी, मिलल ना कोई तहरा जइसन
चुम्बक लागल बा जेकरा कमर में.
नहर -नाहर में छान-छुन के
पोखर -पखार के लांघ-लूंग के
देख लेहनी, मिलल ना कोई तहरा जइसन
चुम्बक लागल बा जेकरा कमर में.

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बूढ़े भी जवान है


ये इश्क़ का रंग है जो बूढ़े भी जवान है
तू चले लहरा के तो झूमता आसमान है.
और कौन है आस – पास जो कोई ख्वाब ले
एक तेरे चोली के रंग पे लूट रहा मेरा बिहार है.

जुल्मी के पाइयाँ, जुल्मी के पाइयाँ परे नई रतिया सारी
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।
मारेला गरहिया में मछली जाल डाली
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।
धीमी -धीमी आँच पे डभकाये रतिया सारी
रात भर खेले पिया, ह छपरा के खिलाडी।

तहरा प्यार में भइल बानी बेकार राजा जी,
हमरा चोलिया के खोल दी आज रात राजा जी.
तन्वा ना मनवा में भी ताप बढ़ता,
जाइ कौना वैधा के पास राजा जी.

का देख के बाबुल हमर चुन देहलन बिहारी
ना कउनो सुहुर बाते ना रहल जिमींदारी।
ऐसे मत कहा बबुनी खून के ह खाटी
रामाश्रय सिंह के पोता ह, चंद्रदेव सिंह के नाती।
ना छोड़ी साथ तहर, चाहे रहल ना जमींदारी।

जिसे तेरी अधरों की चाहत, वो जमाना होगा
जिसे तेरी आँखों की चाहत, वो ग़ालिब का फ़साना होगा।
हम बिहारी हैं, या मिट जाएंगे या तेरी वक्षों पे हमारा आसियाना होगा।
हम बिहारी हैं, हमारे आगे तख्तो-ताज भी कुछ नहीं
हमसे टकराने से पहले खुदा के माथे पे भी पसीना होगा।

दर्द नहीं दिल की दवा दे
बाहों में ना सही, दूर से देख के मुस्करा दे
अब भी मेरी किताबों में तेरी ही तस्वीर है
मुझे न सही, उसे अपने सीने से लगा ले.
दिन भी किसी और का, रात भी किसी और की
ये चूड़ी, कंगन, मेहँदी, और बच्चे भी किसी और के
ये जालिम कम -से-कम, एक टैटू तो मेरे नाम का बनवा ले.

तेरी आँखों का एक रंग मुझे बड़ा मीठा सा लगे
जब तू अपने बाबुल के पीछे छिप के मुस्कराने हाँ लगे.

ख़्वाबों से हकीकत में -२, जो तुम उतर जावों
दास्ताने मोहब्बत में फिर तन्हाई न होगी।
एक घडी ही सही तुम जरा पास आके बैठों
बिहार में हमारे फिर गरीबी ना होगी।

मेरी जान इशारा कर दे तू अपनी इन नजरों से
सब कुछ चढ़ा दूंगा मैं तेरे चढ़ते जोबन पे
तू भी हैं लाखों में लिए हाँ ादाएँ
और मैं भी आगे हूँ अपना सबकुछ लुटाने में.

मुझे तुम्हारी इन आँखों से कोई तो एक ख्वाब मिले
फिर ना मिले ये जहाँ, पर एक जाम तो मिले।
बंध चुके हैं सभी इसमें, किसी एक को तो आसमाँ मिले।
खुदा लिखना कभी वो किस्मत जिसमे कोई लड़की परेशान मिले।
बस एक टुटा ही नहीं हूँ मैं, बाकी सारे अरमान मिटे।
एक हम ही तड़पते रहे इस जहाँ में, बाकी सब हुनरमंद -होशियार मिले।

आज आये हो तो कल का बहाना ना दो,
चांदनी रात को यूँ सुनी जाने ना दो.
मेरी आँखे सदा देखती हैं ख्वाब तेरा
इन आँखों से ये ख्वाब मिटने ना दो.
पहले से ही टूटा हूँ और कितना तोड़ोगे
ठुकराने से पहले इतना बता भी तो दो.
हमें दर्द की आदात हो गयी हैं
एक दवा छोड़ के तुम कुछ भी पिला दो.

मेरी कलम ने लिखा है तेरी कमर पे तिल है
तू झुठला दे, पर ये ही सच है, की वही मेरा दिल है.

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माँ की निगाहों में है


फ़िज़ाओं में रौशनी सितारों से नहीं, दुआओं से है
मेरी राहें-मंजिल मेरी माँ की निगाहों में है.

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जख्म


दरिया और समंदर में, समंदर गहरा है
तेरे हिज़्र का जख्म, हर जख्म से गहरा है.
जझुकि तेरी नजर, तेरे शर्म का पर्दा है
पर इनसे चलें तीरों का जख्म बहुत गहरा है.

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