प्रेम में मेरा प्रुस्कार देखिये,
मेरी तन्हाई और उनका श्रृंगार देखिये।
एक भी दूकान नहीं ऐसा जो मुझे रासन दे,
और उनका गर्म बाजार देखिये।
परमीत सिंह धुरंधर
प्रेम में मेरा प्रुस्कार देखिये,
मेरी तन्हाई और उनका श्रृंगार देखिये।
एक भी दूकान नहीं ऐसा जो मुझे रासन दे,
और उनका गर्म बाजार देखिये।
परमीत सिंह धुरंधर
शहर अंदाज बदल रहा है,
चाँद आकार बदल रहा है,
हम बूढ़े क्या हो रहे?
हर कोई अपनी जबान बदल रहा है.
घर, बाहर और बाजार तक,
आने – जाने और मिलने पे,
लोग नजरे चुरा रहे हैं.
कल तक जो इंतज़ार करते थे मेरा चाय पे,
अब वो हमसे छुप के,
किसी और के साथ, चुस्की उड़ा रहे हैं.
अपने – पराये, नौकर – चाकर,
अब और क्या कहे किसी की?
अब तो दाल में घरवाले बिना मुझसे पूछे,
नमक लगा रहे हैं.
हम बूढ़े क्या हो रहे?
हर कोई अपनी जबान बदल रहा है.
परमीत सिंह धुरंधर
शहंशाह ताज तो बना सकते हैं,
अपने मुमताज के लिए.
लेकिन वो माँझी बिहारी होते हैं,
जो पहाड़ को गिरा दें अपने महबूब के लिए.
Dedicated to Dashrat Manjhi from Bihar.
परमीत सिंह धुरंधर
सखी कैसे खेलीं होली?
सैंया बना दे ता हर साल लरकोरी।
अतना ना अब हो गइल बा झुलौना,
कोई कंधा पे कूदे, त कोई धइले रहे साड़ी।
रोजे रतिया पीया के कहेनी,
तनी रउरो सोची परिवार – नियोजन के,
त खटिया से कहेली सास,
अभी देखे के बा अउरो उनकरा पोता – पोती।
सखी कैसे खेलीं होली?
सैंया बना दे ता हर साल लरकोरी।
परमीत सिंह धुरंधर
जात – धर्म – मजहब में बंधकर,
कब किसने दोस्त बनाया है?
विस्मिल को आस्फाक मिलें,
तो मैंने भी आफताब को पाया है.
अपनों ने ही लुटा है,
खंजर पीठ में गड़ा के.
सिरोजदुल्ला को मीरजाफर मिलें,
तो पृथ्वीराज को जयचंद ने हराया है.
कब नारी ने सम्मान के बदले,
सम्म्मान लौटाया है.
जिसने उसे भेजा गैरों के बाहों में,
मेनका ने उसकी के लिए मातृत्व को ठुकराया है.
परमीत सिंह धुरंधर
सीना – सीने से लगाकर,
वो बोली धीरे से कानों में,
कोई तो एक फूल खिला दो,
अब इस आँगन में.
मन ऊब गया है इस खेल से,
जो खेलते हैं बस बंद कमरे में.
कोई तो एक खिलौना दे दो,
की मैं भी खेलूँ खुले आँगन में.
परमीत सिंह धुरंधर
काँटों ने कब रोका है तुम्हे?
गुलाब को चूमने से.
मगर चुभ जाए तुम्हे तो समझो,
की तुम बहुत असावधान हो राहों में.
बाधाएँ तो निरंतर हैं,
पल – पल में जीवन के.
प्रसव-पीड़ा से नारी को,
कब रोका है मौत के भय ने?
उसी माँ के दूध से तुम हो,
फिर भय कैसा इन प्राणों का?
और कैसे छोड़ दूँ माँ को अपने,
रूप – रस में फंसकर,
बेवफा मेनकाओं के.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे कदम चलना नहीं चाहते,
और पेट भोजन का मोह त्यागना नहीं चाहता।
नयन चाहते हैं उसके यौवन पे ही,
सदा – सर्वदा टीके रहें।
कैसे पुरुषार्थ करे मानव?
जब जिस्म उसके आगोस की,
गुलामी, आँखों की मक्कारी,
को तोड़ना नहीं चाहता।
परमीत सिंह धुरंधर
ए समुन्दर,
तुझे क्या अहसास है मेरे ओठों का?
तूने पीया है,
मैंने सींचा है.
तुमने बाँधा है,
मैंने खिलाया है, उड़ाया है.
तुम्हारे गर्भ में अन्धकार है,
मैंने हर आँगन में दीप जलाया है.
परमीत सिंह धुरंधर
गुनाहों का भी चरित्र होता है,
तभी तो,
स्त्री का शोषण करने वाले,
ही उसके दिल के करीब हैं.
कब समझा है मेनका ने?
प्रेम, मातृत्वा, और वातशल्या को,
तभी तो चाँदी और सोने के बदले,
उसके अंग – अंग पे भोगी – विलासी,
का अधिकार है.
परमीत सिंह धुरंधर