मुस्करा रहा हूँ मैं


अपनी बर्बादियों पे मुस्करा रहा हूँ मैं
और जमाना कहता है, कुछ छुपा रहा हूँ मैं.

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जिंदगी


ए ग़ालिब बता कैसे काटे हम ये जिंदगी?
अधरों पे प्यास, मयखाना पास और जेब तंग हैं.

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तलाश में


कश्तियाँ लहरों पे, किनारों की तलाश में
तेरी जवानी, मेरा शहर पूरा का पूरा आग में.

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रौशनी


रौशनी को ही ढूंढते रहोगे या जलाओगे चिरागों को भी
मोहब्बत ही करते रहोगे या बनाओगे किसी को अपना भी.
बहुत मुश्किल है काटना अकेली ये जिंदगी
जवानी तो गुजर गयी भटकने में, भटकोगे क्या भुढ़ापे में भी.

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मोहब्बत


जो मिल रहे हैं तुझसे वो तेरे अपने है क्या
जो दूर हैं वो देख रहे तेरे सपने है क्या?
मैं नहीं तो तू नहीं, तू नहीं तो मैं नहीं,
बस ये ही एहसास है मोहब्बत
इसके आलावा भी कोई मोहब्बत है क्या?

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हसीं औरत


कोई भी नहीं संभल पाता, शोहरत और दौलत को
और तुम दावा करते हो सँभालने का एक हसीं औरत को.

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चाय ही पिला दिया करो


मोहब्बत ना सही, रोज हमसे मिल ही लिया करो
अधरों के जाम न सही, हाथों से चाय ही पिला दिया करो.

हम उफ़ तक ना करेंगे, तुम जिसे चाहो अपना बना लो
बस मेरे नाम का एक खत लिख दिया करो.

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काला काजल


काला काजल तेरी आँखों में उतर कर किसी का ख्वाब बन गया
जो भी मिला, मिलकर तुझसे, तेरा गुलाम बन गया.
तेरे पावों को चूमकर इतराते हैं धूल-कण
तेरी गालों पे बरस कर, बादल झूम रहा.
तेरी बलखाती कमर पे सारा जहाँ थम गया.
कौन जी रहा है जिंदगी, एक नाम तो बता
तूने जिससे भी मुख फेरा, वो ख़ाक बन गया.
तू खोले अपनी खिड़की या किवाड़ तो करने को दीदार
तेरे दर पे आके सारा जमाना बैठ गया.

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किसका है जमाना


ये दुनिया के धोखे, ये रिश्ते, जमाना
मेरी सरहदों को ना नापे ज़माना।
क़यामत की रात को होगा फैसला
किसका खुदा है और किसका है जमाना।
गैर भी मिलकर समझाने लगे हैं
कब हुआ है किसी का कभी ये जमाना?

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सीढ़िया


तू कैसे चढ़ लेती हैं सीढ़िया मेरे खुदा के दर की
उसके मासूम बन्दों को मिटा के.
अरे बेबसी देख मेरे खुदा की
ऐसे सितम पे भी बैठा है मौन धारण कर.

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