हर लम्हा


ये ज़िन्दगी भी क्या है कि टूटे हैं थोड़ा-थोड़ा हर लम्हा,
ज़िंदा हैं कि क़लम लिखती है बस उसी को हर लम्हा।

चाहा था कि कभी तो सुकून आएगा दिल को,
पर मिलती रही बेताबी की ही सजा हर लम्हा।

आईना भी अब चेहरा देख कर है चुप सा,
बयाँ करता नहीं है मेरे दर्द का किस्सा हर लम्हा।

रिश्तों की किताबें भी अब बोझ लगती हैं,
अधूरी सी कहानी है उनमें छुपा हर लम्हा।

ख्वाबों ने भी अब आंखों से नाता तोड़ लिया,
बस बचा है सहर होने का धोखा हर लम्हा।

चल पड़े हैं सफर में मगर मंज़िलें गुम हैं,
थक कर गिरते हैं फिर संभलते हैं हर लम्हा।

दर्द भी अब अपना सा लगने लगा है,
जैसे कोई अजनबी था बना अपना हर लम्हा।

‘परमित’ लिखता है फिर भी मोहब्बत की बातें,
शायद इसी बहाने बच जाए वजूद हर लम्हा।

RSD

हे ग़ालिब


हे ग़ालिब, उनके हुस्न पे तुम क्या लिख रहे हो?
जो भी लिख रहे हो, मेरा दिल लिख रहे हो.
जानता शहर है की जीना है मुश्किल।
मेरे इस दर्द को ही तुम दवा लिख रहे हो.
हे ग़ालिब, उनके हुस्न पे तुम क्या लिख रहे हो?
जो भी लिख रहे हो, मेरा दिल लिख रहे हो.
कैसे हाँ ढूँढू अब कोई रास्ता
मेरी हर राह पे तुम उनका घर लिख रहे हो.

RSD

याराना


तेरी-मेरी आँखों में एक इशारा हो जाए
तेरा जो रंग है वो मेरा हो जाए.
कुछ और नहीं माँगा है रब से मैंने
बस तेरे-मेरे दिल का याराना हो जाए.

Rifle Singh Dhurandhar

तुम #Harvard नहीं हो मेरा Heart हो प्रिये


तुम हार्वर्ड नहीं हो
मेरा हार्ट हो प्रिये।
तुम्हे पाने के लिए
रह गया मैं अकेला हूँ प्रिये।
तुम सिर्फ एक बिल्डिंग नहीं
मेरा ख्वाब हो प्रिये।
बस तुम्हारे साथ चलने के लिए
रह गया मैं अकेला हूँ प्रिये।
सारे ख्वाब टूट गए, अरमान टूट गए
पिता के लाडले गोद से छूट गए
की तुम सिर्फ एक मुकाम तो नहीं
मेरी सांसे हो प्रिये।
तुम्हे पाने के लिए
रह गया मैं अकेला हूँ प्रिये।

It was a dream to be here

Still, a dream exists in my heart

To be with you forever. 

Rifle Singh Dhurandha

गज-ग्राह संग्राम


दो नैनों के भवर में सारा जग डूबा है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
आधा पहर ढल गया और सागर अथाह है
हे जगत के स्वामी तुम्हारा भक्त डूबा है.
सम्पूर्ण बल क्षीण हुआ, ग्रीवा तक अब नीर है
अंत समय में स्वामी अब तुम्हारा ही सहारा है.

Rifle Singh Dhurandhar

बेचैन कर जाऊंगा


इस कदर टुटा हुआ हूँ
छूने से बिखर जाऊंगा।
इरादा तो ऐसा कुछ नहीं
मगर ठहर नहीं पाउँगा।

तेरी आँखों में कैद कई
इस खेल के माहिर धुरंधर
मैं तो हारा हूँ मगर
तुझे बेचैन कर जाऊंगा।

First two lines are not mine. It is modified from Gulam Ali jee ghazal.

परमीत सिंह धुरंधर 

ये वस्त्र अब दरिंदे


ये प्रेम की वादियाँ
ये रातों के शिकंजे।
ये जवानी का दौर
और ये तेज होते पंजें।

धमनियों में दौरने लगा है
अब लहू कुछ यूँ
की जिस्म को लगते हैं
ये वस्त्र अब दरिंदे।

तुम्हारी बाहों में आकार
यूँ आजाद होने का एहसास है
जैसे आसमा के तले
पंख पसारे परिंदे।

परमीत सिंह धुरंधर

तुम मिलो तो सही


मुस्करा – मुस्करा के शर्मा रही हूँ
तुम मिलो तो सही – २
शर्मा – शर्मा के मुस्कराऊंगी।

अभी तो बहके हैं मेरे कदम
तुम मिलो तो सही – २
संवर – संवर के तुम्हे बहका दूंगीं।

चलने लगी हूँ मैं ढलका के दुपट्टा
तुम मिलो तो सही – २
उड़ा – उड़ा के दुपट्टा चलने लगूंगी।

सारी रात देखती रहती हूँ मैं आईना
तुम मिलो तो सही – २
सारी रात बस तुम्हे देखती रहूंगी।

परमीत सिंह धुरंधर

दबा देना तुम पाँव माँ का


आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

तुम मुझको मोहन कहना
कहूंगा राधा तुमको मैं.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

थोड़ा दबा देना तुम
पाँव माँ का रातों में.
ख्याल रखूंगा जीवन भर
मैं बढ़कर अपनी साँसों से.

आवो,
तुमको प्यार करूँ
जीवन की इन बाधाओं में.
पहला पग मैं रखूंगा
काँटा आये जो राहों में.

परमीत सिंह धुरंधर

फिराक हम हो गए


जवानी के दिन थे और कुर्बान हम हो गए
उसकी एक नजर के आगे फिराक हम हो गए.
वो खिलने लगी हर दिन दोपहर सा
और रातों को ना बुझने वाला चिराग हम हो गए.

कसने लगा था अंगों पे उसके वस्त्र
ठहरने लगा था पाने – जाने वालो का उसपे नजर.
किस्मत में जाने वो किसके थी
मगर कुछ दिनों के बादशाह हम हो गए.

Dedicated to Firaq Gorakhpuri……

परमीत सिंह धुरंधर