अँखियाँ लड़ाके पीया से सखी
निंदिया आवे रोजे भोर में.
सास दे तारी रोजे गारी
पर मीठा लागे उनकर बोल रे.
Rifle Singh Dhurandhar
अँखियाँ लड़ाके पीया से सखी
निंदिया आवे रोजे भोर में.
सास दे तारी रोजे गारी
पर मीठा लागे उनकर बोल रे.
Rifle Singh Dhurandhar
वो भी क्या दिन थे?
पिता के साथ में
हम थे हाँ लाडले
आँखों के ख्वाब थे.
जो भी माँग लिया
वो ही था मिल जाता
वो थे आसमान
और हम चाँद थे.
भाग्या प्रबल था
और हम भी प्रबल थे
वो कृष्णा थे हमारे
हम प्रखर थे उनके छाँव में.
Rifle Singh Dhurandhar
हर – हर, हर -हर, शिवशंकर
महादेव, बम – बम.
कैलास से उतरो, की अनाथ से हैं हम.
भटक रहें हैं दर -दर
आ गए प्राणों पे भी लाले
तुम्ही बताओ पिता, अब किसको पुकारे हम?
भागीरथ को भय नहीं
हाँ, अपनी हार का
पर कब तक उठाएंगे हम माथे पे ये कलंक?
पीड़ा मेरी अब तो
पहाड़ सी हो गयी
अब तो खोल दो प्रभु अपने ये नयन.
Rifle Singh Dhurandhar
कटती नहीं हैं रातें पिया परदेश में आके
एक रात तो बिता लो संग खाट लगाके।
किससे करूँ मन की बातें, किसके संग मनुहार?
कोई दर्द फिर जगा दो, सीने से हमको लगाके।
Rifle Singh Dhurandhar
देहिया गुलाबी करके
नयना शराबी करके
बालाम परदेशी हो गए.
मनवा के गाँठ खोल के
चिठ्ठी – आ – पाती पढ़ के
बालाम परदेशी हो गए.
अंग – अंग पे निशानी दे के
चूल्हा-चुहानी दे के
बालाम परदेशी हो गए.
मुझको बेशर्म करके
लाली और मेहँदी हर के
बालाम परदेशी हो गए.
मुझसे छुड़ा के मायका
मुझको दिला के चूड़ियाँ
बालाम परदेशी हो गए.
करवट मैं फेरूं रात भर
सुनकर देवरानी की चुहल
बालाम परदेशी हो गए.
Rifle Singh Dhurandhar
ए मेरे दिलवर
मुझे प्यार करके तू
बदनाम कर दे आज-२.
फिर पाने को तुझे
ढूंढती रहूं
बेशर्म होके मैं
हर सुबहों -शाम.
मेरा रूप-रंग, यौवन,
ये साजों-श्रृंगार
छू कर इन्हें
पावन कर दे आज.
तू बरसे मुझपे
बादल बनके
मैं भींगती रहूं
सारी-सारी रात.
लूट जाने दे मुझे
खलिहान में अपने
इससे मीठी ना होगी
किसी आँगन की खाट.
Rifle Singh Dhurnahdar
हम छपरहिया
जैसे घूमे हैं पहिया
अरे, दुनिया घुमा दें.
अरे तीखें नैनों वाली
चोली की लाली
अरे हम चाहें तो
आँखों का सुरमा चुरा लें.
यूँ तो भोले -भाले
हैं हम सीधे -सादे
आ जाएँ खुद पे
तो बिजली गिरा दें.
Rifle Singh Dhurandhar
बहुत याद आते हो पिता
इस समंदर में.
ये युद्ध है सत्ता का
ये सुख है सत्ता का
सब अधूरा है इस आँचल में.
अम्बर तक पंख पसारे
उड़ता हूँ.
फिर भी एक सूनापन है
इस जीवन में.
मौत का वरन मुस्करा कर
कर लेंगें
अगर उस तरह आप मिलोगे।
प्रेम है तो बस पिता के आलिंगन में.
Rifle Singh Dhurandhar
हम समंदर हैं दोस्तों
खारे रह गए इस जमीन पे.
कुछ मिला भी नहीं जिंदगी में
बस मांगते रह गए हम नसीब से.
उनसे इतनी थी हाँ मोहब्बत
हर दर्द सह गए हम ख़ुशी से.
कुछ मिला भी नहीं जिंदगी में
बस मांगते रह गए हम नसीब से.
वो जिनके लिए हम बने थे
वो खो गए कहीं इस भीड़ में.
कुछ मिला भी नहीं जिंदगी में
बस मांगते रह गए हम नसीब से.
खुदा भी नहीं जानता है
क्या लिखा है उसने मेरी लकीर में?
कुछ मिला भी नहीं जिंदगी में
बस मांगते रह गए हम नसीब से.
Rifle Singh Dhurandhar
पिता और मेरा प्रेम
जैसे गंगा की लहरों पे
उषा की किरणें
और प्रकृति मुस्करा उठी.
हर्षित पिता मेरी उदंडता पे
उन्मादित मैं उनकी ख्याति पे
पिता -पुत्र की इस जोड़ी पे
प्रकृति विस्मित हो उठी.
अभी जवानी चढ़ी ही थी
अभी मैं उनके रथ पे चढ़ा ही था
की प्रकृति ने
विछोह की घड़ी ला दी.
Rifle Singh Dhurandhar