जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू बोरसी के आग
अब लहकत अलाव भइल बारू।
जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू सरसो के तेल
अब ठंढा हिमताज भइल बारू।
परमीत सिंह धुरंधर
जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू बोरसी के आग
अब लहकत अलाव भइल बारू।
जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू।
पहिले रहलू तू सरसो के तेल
अब ठंढा हिमताज भइल बारू।
परमीत सिंह धुरंधर
बाँध अ मत ऐसे जोबना ए गोरी
हाहाकार मच गइल बा देख तहार ढोंढ़ी।
आइल बारन छपरा के धुरंधर मैदान में
त आज तहार चोलिया रंगाई ए गोरी।
आरा – बलिया से बच गइलू
मगर आ गइलू नजरिया में
माहिर छपरा के धुरंधर के
त आज छपरा में नकिया छेदाइ ए गोरी।
अभी बाली बा उमर, येही पर त चढ़ी रंग
जतना उड़ेल बारू, उड़ ला
दाना जी भर के चुग ला
त आज पंखिया तहार कटाई ये गोरी।
परमीत सिंह धुरंधर
जब से जवान भइल बारू
धनिया से धान भइल बारू
पहिले धामिन रहलू तू
अब गेहुंअन भइल बारू।
डस अ तारु
खेता – खेता चढ़ के
खलिहान – बथान में
केंचुल छोड़तारु।
परमीत सिंह धुरंधर
इस कदर टुटा हुआ हूँ
छूने से बिखर जाऊंगा।
इरादा तो ऐसा कुछ नहीं
मगर ठहर नहीं पाउँगा।
तेरी आँखों में कैद कई
इस खेल के माहिर धुरंधर
मैं तो हारा हूँ मगर
तुझे बेचैन कर जाऊंगा।
First two lines are not mine. It is modified from Gulam Ali jee ghazal.
परमीत सिंह धुरंधर
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
तू थाम रही है जाने अब किसकी हाँ बाहें
ना वो शर्म ही रही, ना वो घूँघट ही रहा.
तूने ही हमको मयखाने से लेकर
मंदिर की सीढ़ियां चढ़ाई थी कभी
अब ना वो देवी ही रहीं, ना साकी ही रहा.
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
मासूम नयन तेरे और भोले चेहरे से
ना जाने किन-किन को यहाँ धोखा ही मिला?
क्या वफ़ा करे मोहब्बत में कोई ?
जिसकी किस्मत में तू महबूब है मिला।
पलकों का तेरे ना वादा ही रहा
ना परमीत ही रहा, ना Crassa ही रहा.
परमीत सिंह धुरंधर
आम -कटहल
गेहूँ -धान
जामुन -लीची
इन नामों को किसान जीवन देता है.
ख़्वाबों को हकीकत
और जिव्हा को स्वाद देता है.
परमार्थ क्या, स्वार्थ क्या?
अरे राजा के यज्ञ
और ब्राह्मणों के हवन -कुंड में
देवताओं के आव्हान को
सफल करने को घी और अन्न देता है.
धरा को सुंदरता -सौम्यता
पक्षी – कीट, मूषक को
परिश्रम का मौक़ा
गाय – बैल को देवी -देवता
और पत्नी को गृहलक्ष्मी बनने
का सुनहरा अवसर देता है.
पुत्र को आलस
पुत्री को अच्छे वर का ख्वाब
चिलचिलाती धुप और कड़कड़ाती ठंढ में
उषा के आगमन पे
बिना विचलित हुए
किसान हाथों में अपने
हल थाम लेता है.
इंसान इसी रूप में
मुझे नारायण, भोलेनाथ
और भगवान् लगता है.
परमीत सिंह धुरंधर
मैं समंदर हूँ कोई दरिया नहीं
मुझपे हुकूमत, इतना आसान नहीं।
प्यासा हूँ तेरी लबों का
मिट जाए एक रात में, ऐसी प्यास नहीं।
परमीत सिंह धुरंधर
दर्द में उनसे तू शिकायत न कर
ये शहर है उनका, तू बगावत न कर.
मिलेंगे तुझे कई हुस्न इस सफर में
यूँ ठहर कर उनसे मोहब्बत न कर.
परमीत सिंह धुरंधर
दरिया का सफर देखिये
समंदर के इश्क़ में
राहें बदल – बदल कर मचली
मगर मजिल बस एक है.
किनारें टूटते हैं,
डूबते हैं, बिखरते हैं
मगर साथ-साथ चलते हैं
इस सफर में
इनका साथ अटल है.
परिंदों का सफर देखिये
आसमान के इश्क़ में
छोड़कर डाल, घोंसला, दाना-पानी
निकल पड़ते हैं उषा के आगमन पे.
हारते, उड़ते, प्यासे
संध्या पे लौट आते हैं
मगर अगली सुबह फिर
से वही चाहत, वो ही उड़ान
क्योंकि उनका उत्साह अटल है.
फूलों का सफर देखिये
उषा के इश्क़ में
खिलती में हर सुबह
उषा के चुम्बन से.
टूटती हैं, बिखरती हैं
काँटों से उलझ -उलझ कर
बदरंग हो जाती हैं.
मगर सुबह फिर नई कलि खिलती है
इनका विश्वास अटल हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
मानव तू साधारण सा
ठान ले तो दानव सा
अंत ना हो जिसका
उस दम्भ का बिस्तार कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
माया – मोह निकट नहीं
मन – मष्तिक विकट नहीं
काल के कपाल पर
तू अपना नाम गढ़.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
निर्मल पवन सा
निर्भीक गगन सा
पावन गंगा सा
हर दिशा में प्रवाह कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
काँटों और फूल से
कृपाण और शूल से
तन का सम्बन्ध जोड़
मन को ना अधीर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
पत्नी ना पुरस्कार
अपमान ना तिरस्कार
खोने को अपना सब कुछ
हर क्षण खुद को तत्पर कर.
पथ को प्रशस्त्र कर
समस्त को अस्त कर
धीर बन, वीर बन.
परमीत सिंह धुरंधर