बिहारी


मन का बिहारी
तन का बिहारी
हारा है कब, बताओ?
जब तक है लाठी हाथों में
किसने पछाड़ा, बताओ?

हम जो उगा दे वो बंजर पे फूल
हम मिटा दे चाहे पत्थर या शूल
भोलेनाथ के सिवा
कहीं सर झुकाया तो बताओ।
मारिसस भी जाके
छपरा को भुलाया तो बताओ।

वो ले गए सोना
वो ले गए चांदी
काले पीतल को
सोना न बनाया तो बताओ।
उलझनों से कभी मुख चुराया
तो बताओ।

परमीत सिंह धुरंधर

परफेक्ट प्यार


उम्र भर जो भागी एक परफेक्ट प्यार को
अब लिख रहीं हैं की प्यार परफेक्ट नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

पिता की गोद छोड़कर जो भागी थी प्यार में
उसके चार -चार बच्चों की माँ बनके भी आनंद नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

जुल्फों में बांधकर जिसने कइयों को डुबाया है
अजब है उस कातिल को अब क़त्ल का मजा नहीं आता.
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

ये शहर छपरा सभी का है सिर्फ मेरा ही नहीं
मगर हर किसी के नाम में छपरा नहीं होता।
इससे बड़ी प्यास क्या होगी जीवन में?
प्यार पाकर भी कोई प्यार नहीं पाता।

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी भर की कमाई


किस्से हैं, कहानी हैं
हर दर्द की निशानी है
मिलती हो जब तुम तो
चढ़ती जवानी है.

ढलती हैं आँखों से
जब तुम्हारे ये शर्म
आँगन से बथान तक
छा जाती हरियाली है.

हर धुप तुमसे निखरी
और मीठी है चांदनी भी
तेरे ओठों पे ये मुस्कराहट
जिंदगी भर की कमाई है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये शहर मेरा है


दर्द है, मगर जिंदगी जी रहा हूँ
ये शहर मेरा है, मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

फासला – 2


तुम्हे चाहत है जिस समंदर की
उसका किनारा कहीं पराया ना लगे.

हम तो जी लेंगें यूँ ही तड़प -तड़प के
गुलाबों की सेज कहीं तुझे रुलाया ना करे.

परमीत सिंह धुरंधर

फासला


रौशनी की इतनी भी ना कर चाहते
की अँधेरे में एक फासला सा लगे.

परमीत सिंह धुरंधर

आँखों की तेरी चतुराई


The heart goes high
With your smile
You are the beauty
I have been dreaming
Throughout the life.
I feel to live with you
If you can hold me tight.

I love all your curves
And आँखों की तेरी चतुराई
I am from Chhapra
Want to settle in Shanghai
Let’s play one day again
Asa husband and a wife.
I feel to live with you
If you can hold me tight.

Parmit Singh Dhurandhar

नवयौवना


दिल समझेगा तेरा जिस दिन मुझको
उस रात तू मेरी बाहों में होगी
अरे बन के नवयौवना तू
सेज पे मेरे फिर पिघलेगी।

परमीत सिंह धुरंधर

मौक़ा मिले


कुछ आपके करीब से गुजरने का मौक़ा मिले
कुछ आपके पहलु में ठहरने का मौक़ा मिले
कभी निगाहों, कभी बाहों
कभी आपकी जुल्फों से खेलने का कोई मौक़ा मिले
ठहर जाए जिंदगी वो पल बनकर
जिस पल में तुझे अपना कहने का मौक़ा मिले।

परमीत सिंह धुरंधर

घुलने को मदिरा बनके


बारिश की बूंदें भी तड़प उठती है तन पे गिर के
ना चमको मेघों में तुम बिजली से छुप के
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके
कब तक चमकेगी मेघों के बीच यूँ बिजली बनके
उतर आवो बाहों में
नशों में घुलने को मदिरा बनके।

परमीत सिंह धुरंधर