छपरा का मल्लाह


धोबन इतना ना इठला
अपने जोबन पे.
बड़ी किस्मत से मिलता है
किसी को छपरा का मल्लाह।

मैं नहीं इठलाती
मेरी कमर ही लचक रही.
रखती हूँ जिसपे
छपरा के धुरंधर को बाँध के.

परमीत सिंह धुरंधर

रसोई का आंटा, आंटे की लोई और लोई की रोटी


वो मित्र बनें
वो शत्रु बनें
वो प्रेमी बनें
वो भाई बनें
दिन के धागे
और रातों सुई बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ ना बन सके।

वो दिल बनें
वो धड़कन बनें
वो दिमाग बनें
वो नजर, तंत्रिका
रुधिर और कोशिका बनें।
वो रसोई का आंटा
आंटे की लोई
और लोई की रोटी बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ भी ना बन सके.

वो किताब बनें
वो कॉपी बनें
वो कलम बनें
सीने से चिपक – चिपक कर
वो दुप्पट्टा
फिर रजाई
और फिर रजाई की रुई बनें।
एक हम ही हैं
जो कुछ बी ना बन सके.

परमीत सिंह धुरंधर

एक सिहरन


नयना जब तुमसे मिले
तो एक सिहरन सी उठी अंग-अंग में मेरे
और मैं संवर गयी.
सखियाँ मेरी जो ना समझी
मेरे ह्रदय को
देख के दर्पण
मैं स्वयं वो सब समझ गयी.

परमीत सिंह धुरंधर

काली – काली सी हीर


तू काली – काली सी
पर लगती है कोई हीर.
कभी अकेले में मुझसे मिल
संग लगाएंगे कचहरी।

जितना तुझे देखता हूँ
उतनी तू भा रही.
ये नशा है मेरा
या तेरी जादूगरी।

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे सागर लहरा गया


ना दौड़ा करों यूँ उछल – उछल के
की वक्षों पे सागर लहरा गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.

अभी -अभी तो चढ़ी जवानी
अभी से मौसम बदल गया.
मन तो मेरा फ़कीर है पर
देख के तुमको ठहर गया.

परमीत सिंह धुरंधर

छपरा की मिट्टी


जो तन्हा है
वो Crassa तो नहीं है.

जिसे प्यार मिल गया
उसे वक्त ने तरासा तो नहीं है.

दो-बूंदों में लहलहा जाए जो फसल
उसमे किसान का पसीना तो नहीं है.

जिन्हे अपने इतिहास का ज्ञान नहीं
उन राजपूतों की कोई गाथा तो नहीं है.

हर शहर की किस्मत में मेरा साथ नहीं
ऐसा शहर भी नहीं, जहाँ मेरी चर्चा नहीं है.

छपरा की मिट्टी पे जो भी फूल खिला
उसे हवाओं ने बांधा तो नहीं है.

परमीत सिंह धुरंधर

घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम


पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे भोले-भाले
और मैं चतुर दुल्हन।
देखेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

घोड़ा दौड़े सरपट – सरपट
ठंठी – मीठी बहे रे पवन.
घूमेंगे नगरिया बैठ के टमटम।

पिया मोरे गोरे -गोरे
आ काले – काले हम.
देखेंगें शहरिया बजाके प्याल छम-छम.

मेरे एक नजर पे
बहके उनके हर कदम.
देखेंगें नगरिया बनके हमदम।

नैन मेरे चंचल
और मैं नटखट।
घूमेंगे नगरिया उठाके घूँघट।

पिया मोरे आगे – आगे
आ पीछे – पीछे हम.
घूमेंगे शहरिया बैठ के टमटम।

The poem is written for the Cabriolet which was once cultural part of Bihar. I have memories still fresh in mind. I had enjoyed it whenever I went to Katihar during my childhood.

परमीत सिंह धुरंधर

तू भी है राणा का बंसज


तू भी है
राणा का बंसज
फेंक जहाँ तक
भाला जाए.
जीत – हार तो
श्रीकृष्ण के हाथ है
कब तक जीवन यूँ जीया जाए?

अश्वों को थाम के
उतर जा कुरुक्षेत्र में
कब तक भोग -विलास में
समय बिताया जाए?
माना की तेरे नसीब में
यौवन का सुख नहीं
तू ही बता फिर धरती पे
किसे महाराणा बुलाया जाए?

गर नहीं विश्वास
तुझे ही लहू का
तो फिर कितना तुम्हे?
इतिहास पढ़ाया जाए.
सब हैं अमृत के प्यासे
किसकी प्यास गरल से बुझाई जाए?

प्रचंड-प्रबल वेग से गंगा
आतुर है सृष्टि को मिटाने को
काल को जो बाँध ले
उस महाकाल को क्यों न पुकारा जाए?
जीवन उसी का सार्थक है जग में
युगो -युगो तक जिसका नाम गाया जाए.

परमीत सिंह धुरंधर

First two lines (तू भी है राणा का बंसज. फेंक जहाँ तक भाला जाए. ) were written by Dr. Kumar Vishwas.

एक शिकायत है


नजर है, नजाकत है
अदा में अदावत है.

कमर है, क़यामत है
खुदा की इनायात है.

ना रखा करो यूँ पर्दा
बस ये ही तो एक शिकायत है.

परमीत सिंह धुरंधर

ये शहर है दोस्तों


दौलत की चमक किसे नहीं भाती?
ये शहर है दोस्तों, यहाँ रोशनी नहीं आती.
रिश्तों की राहें तो बहुत हैं यहाँ
मगर कोई राह दिल तक नहीं जाती।

परमीत सिंह धुरंधर