ए शिव तुम कहाँ हो-2?


सत्ता के जो लोभी हैं
उनका कोई रिश्ता नहीं।
जो लिख गए हैं कलम से
वो कोई इतिहास तो नहीं।

तुम क्या संभालोगे मुझे?
जब तुम्हारे कदम सँभालते ही नहीं।
तुम्हारा मुकाम अगर दौलत है तो
मेरी राहें वहाँ से गुजरती ही नहीं।

जमाना लिखेगा तुम्हे वफादार
पर हुस्न, जवानी में वफादार तो नहीं।
कुछ किस्से चलेंगे मेरे भी
पर उनमे आएगा तुम्हारा जिक्र तो नहीं।

ये अधूरापन ही है अब बस मेरा जीवन
पूर्णता की तलाश और चाहत तो नहीं।
तुम मिल भी जाओ किसी शाम तो क्या?
उस शाम में होगी अब वैसी बात तो नहीं।

Dedicated to Punjabi Poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

कुछ किस्से


कुछ किस्से
वो कमर से लिख गयीं।
कुछ किस्से
वो नजर से लिख गयीं।

जब और लिखना
मुमकिन ना रहा.
वो अपने अधरों को
मेरे अधर पे रख गयीं।

परमीत सिंह धुरंधर

क्या मतलब?


जो सफर में है उसे शहर से क्या मतलब?
मुझे शौक तेरी अधरों का है, तेरी वफ़ा से क्या मतलब?

ला पिला दे तू हलाहल का प्याला
जब तू ही किस्मत में नहीं तो अंजाम से क्या मतलब?

परमीत सिंह धुरंधर

ए शिव तुम कहाँ हो?


भीड़ में बहती जो वो नीर तो नहीं
तन्हाई में सूखती वो पीर तो नहीं।

टूटते तारें आसमाँ के
कहीं उनका निशाँ तो नहीं।

व्याकुल मन जिसे पल – पल पुकारे
वसुंधरा पे वो कहीं तो नहीं।

इससे बड़ी पराजय क्या होगी?
जब जीत की कोई लालसा ही नहीं।

उतार दो तुम ही ये खंजर मेरे सीने में
इन धड़कनों को तुम्हारी वेवफाई पे यूँ यकीं तो नहीं।

मुझे नहीं पता ए शिव तुम कहाँ हो?
मगर कोई और नाम सूझता भी तो नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

दाना डाल दूँ


रक्त के हर बून्द की तुम बन गयी हो प्यास
तुम मिलती हो तो लगता है वक्त भी ख़ास.
तो मत रहो यूँ दूर – दूर, शर्म में बंध कर
आवो, मैं बेशर्म बनके तुम्हारी बेड़िया तोड़ दूँ।

मौन हो तुम पर मैं जानता हूँ
तुम्हारे ख़्वाबों में भी उड़ते हैं कई पंक्षी
तुम कहो तो आज तुम्हारे पंक्षियों को
मैं भी थोड़ा अपना दाना डाल दूँ.

तुम्हारे मुख पे घूँघट और ये झुके नयन
कब से बन गए हैं ये तुम्हारे बंधन?
ये तो मुझको रिझाने के तुम्हारे श्रृंगार हैं
तुम कहो तो आज थोड़ा
तुम्हारे अंगों का मैं श्रृंगार करूँ।

परमीत सिंह धुरंधर

नादानी पे है


हर किसी की नजर जवानी पे है
बस हम ही हैं सनम जो नादानी पे है.

सब हैं यहाँ दिल जीतने को तेरा
बस हम ही हैं सनम जो दिल हारने पे है.

दौलत – शोहरत, क्या नहीं?
ये तेरे दामन को चाँद -तारों से सजा देंगे।
बस हम ही हैं सनम जो तेरे नखरे उठाने पे हैं.

ना पूछा कर हमसे,
क्या कर सकते हैं तेरे लिए?
जहाँ से सब तेरा साथ छोड़ दे,
वहाँ से हम निभाने पे हैं.

परमीत सिंह धुरंधर


रूप और धुप दोनों पल – दो – पल के मेहमान हैं
ढलते हैं, तो बचता कोई नहीं इनका निशाँ हैं.

वृक्ष अगर साथ हो तो फिर धुप भी मीठी छावं हैं
वफ़ा में घुला रूप तो अमृत सामान है.

परमीत सिंह धुरंधर

कलमुही का ह्रदय तेरा बटुआ जानता है


चाँद मेरी आँखों का इशारा जानता है
क्या करता है Crassa ये जमाना जानता है?
अच्छा है की तू मेरी ना बनी, आज भी तेरे पीछे
दिल मेरा, दीवाना भागता है.

XXXXXXXXX part2 by wife XXXXXX

यूँ शहर का नशा ना किया कर Crassa
तेरे लिया दही का निकला है मक्खन ताजा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सारी रात मुझको, मेरा जोबन तोड़ता है.
दर्द क्या है विरह का, ये मेरा ह्रदय जानता है?
कहाँ – कहाँ मुँह मारता है Crassa, ये जमाना जानता है?

यूँ जन्मों का बंधन ना तोड़ो तुम Crassa
तुम्हारे लिए उठाउंगी जीवन की हर पीड़ा।
यूँ सौतन के पास ना जाया कर राजा
सजी – सजाई सेज, अब गरल लगता है.
अच्छा है की मैं ही तेरी हाँ बनी
उस कलमुही का ह्रदय, बस तेरा बटुआ जानता है.

This poem is dedicated to Panjabi poet Shiv Kumar Batalvi.

परमीत सिंह धुरंधर

तू घूँघट जो उठा दे


दो नैना तेरे काले – काले, चल रहे हैं जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, दहक जाए ये जमाना।
कमर तेरी बलखाये, जिसका सागर है दीवाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, बहक जाय ये जमाना।

अंग – अंग पे जैसे बहार आयी है
कमर हुई है वीणा, नयन कतार हुई है.
ये धुप है या छावं, तप रहा है ये जमाना
तू घूँघट जो उठा दे तो, चालक जाए ये पैमाना।

परमीत सिंह धुरंधर

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो


यूँ चहका ना कर लाडो
नजर में शिकारी के आ जायेगी।
अभी तो एक कच्ची कलि है तू
बिना खिले ही मुरझा जायेगी।

यूँ निकला ना कर बाहर लाडो
नजर में गिद्धों के आ जायेगी।
अभी तो मासूम है बड़ी तू
बिन उड़े ही पिंजरे में आ जायेगी।

तेरा रंग है सच्चा मेरी लाडो
पर अब ये बस्ती सच्चा नहीं।
यूँ किसी से ना मिला कर लाडो
नजर में बाजों के आ जायेगी।
अभी पंख तेरे कमजोर हैं
पंजे में दुश्मनों के आ जायेगी।

परमीत सिंह धुरंधर