ये रौशनी चेहरे पे, ये सादगी चेहरे पे
किस्मत में फासला लिख गया
वरना रखते हम आपको
जीवन भर अपनी पलकों पे.
परमीत सिंह धुरंधर
ये रौशनी चेहरे पे, ये सादगी चेहरे पे
किस्मत में फासला लिख गया
वरना रखते हम आपको
जीवन भर अपनी पलकों पे.
परमीत सिंह धुरंधर
शहर को क्या पता है किस्मतें -द्वन्द का?
मेरे दिल से पूछों जिसे नशा है तुम्हारे अंग – अंग का.
उलझनों में बांध के क्या मोहब्बत करोगे?
ख्वाइस तुम्हे दौलत की और मुझे तुम्हारे वक्षों का.
राहें बदल – बदल कर कौन सी मंजिल पा लोगे?
स्थिर होने पे बुद्ध के, द्वार खुला था ज्ञान का.
परमीत सिंह धुरंधर
कल रात मेरे सपने में सरदार पटेल आये और बोले इस जन्म में वो ही अमित शाह के रूप में भारत की सेवा को अवतरित हुए हैं. कश्मीर का जो काम अधूरा रह गया था वो इस बार पूरा कर के जायेंगें।
मैंने जैसे ही पूछा की नेहरू जी भी अवतरित हुए होंगे क्यों की वो कैसे ये देख सकते हैं? लेकिन सरदार पटेल कुछ बोलते उसके पहले ही वो अदृश्य हो गए और मेरी निंद्रा टूट गई. अब मन और भी व्यथित है की आखिर वो मेरे ही सपने में क्यों आएं? या ऐसा है की वो हर भारतीय के सपने में आये या आ रहे है और ये बात बता रहे हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरी कुछ सरहदे हैं
तुम्हारे कुछ रास्ते
दोनों मिल जाएँ
तो फिर अपनी रियासते।
सत्ता पे बैठे लोगो को
हम घेर लेंगें
तुम साथ चलो तो
तुम्हे भी कुछ सुन लेंगे।
ह्रदय को भाने
लगी हो तुम
तुम फूल बनकर खिलो तो
हम भौंरा बन लेंगे।
तुम्हारी नजर का तीर
अभी तक मेरे जिगर में है
तुम कहो तो
इस जख्म के साथ जी लेंगें।
परमीत सिंह धुरंधर
कण – कण में व्याप्त है श्रीराम
चाहे अयोध्या हो या अंडमान।
मंदिर बने या ना बने
जयकारों में गूँजते रहेंगे श्रीराम।
भूमण्डल के हर कोने – कोने मे
जन – जन के ह्रदय में है श्रीराम।
परमीत सिंह धुरंधर
सखी, कैसे सुनाई आपन दुखड़ा
बारन अनाड़ी हमार सैंया।
सब कोई हो गइल भवसागर पार
मोदी – मोदी जाप के.
बस डूब गइलन हमार सैंया
फंस के महागठबंधन के माया-जाल में.
परमीत सिंह धुरंधर
जिंदगी उदास थी
तो दोस्तों ने बुला लिया।
बोलें, “थोड़ा मुस्करा परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।
मिले चारों यार मेरे
तो रात भर
वही किस्सों की पुरानी केतली
चूल्हे पे बिठा दिया।
वो बोलें, “थोड़ा कुछ निकाल परमीत”
तो मैंने ठहाका लगा दिया।
परमीत सिंह धुरंधर
ह्रदय की तुम स्वामिनी
और मैं हूँ तुम्हारा पतंग।
कट – कट के मैं गिरूंगा
पर चूमूंगा तुम्हारे अंग.
चन्दन की तुम सुगन्धित बेल
और मैं हूँ तुम्हारा भुजंग।
विष को अपने मैं हरूँगा
लिपट के तुम्हारे संग.
परमीत सिंह धुरंधर
गहन – गहन अध्ययन करके भी
तुम्हारे सौंदर्य से मैं हार गया.
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे अधरों से पान करूँ?
वेद – पुराण पढ़ कर भी
मैं हृदय अपना ना साध पाया।
तुम कहो अब ए सुंदरी
कब तुम्हारे यौवन का रसपान करूँ?
परमीत सिंह धुरंधर