तितली


सुनहरी तस्वीरें सुनहरी ही रहेंगी,
तू मेरी न सही, पर किसी की तो बनेगी।

सिख ले तू किसी से वफ़ा थोड़ी सी कभी
कब तक यूँ तितली बनकर उड़ती रहेगी?

तोड़ना – उजाड़ना लड़कपन का है खेल
दूसरे के दर्द पर तब तक तू इठलाती रहेगी।

बांध ले खुद को किसी के मोहब्बत में
कब तक जवानी अपनी लुटाती रहेगी।

परमीत सिंह धुरंधर

आनंद


जो पतित है, वही पावन भी है.
जो मलिन है वही पारस भी है.

जलता है दिया जमाने के लिए
पर उसके लिए बस अन्धकार ही है.

क्या माँगूँ खुदा तेरे दर पे यहाँ?
जब आंसुओं में मेरे तेरा साया भी है.

तू जी कर गया, बनके मानव यहाँ
पता है तुझे, इस पीड़ा में ही प्यार भी है.

तू ठगता रहे, तू छलता रहे, शिकवा नहीं तुझसे
इस छलावे में ही मिलता आनंद भी है.

एक ही खुदा सबका, एक ही पीड़ा सबकी
इसी पीड़ा ने तुझसे सबको बांधा भी है

परमीत सिंह धुरंधर

जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम


जब श्रीराम को आना होगा
श्रीराम आयेंगे।
अत्याचारी से कह दो
संग हनुमान जी भी आयेंगे।
जब मंदिर बनना होगा
मंदिर बन जाएगा।
जन – जन के ह्रदय में हैं श्रीराम
ह्रदय से कैसे मिटाओगे?

इस माटी का रंग उनसे
इस माटी की खुशबु हैं श्रीराम।
मीठी हो जाती है धुप भी
अगर लिख दें
हम आँगन में श्रीराम।
घर – घर में बसे हैं
हनुमान-ध्वज में श्रीराम
घर – घर से कैसे मिटाओगे?

परमीत सिंह धुरंधर

क्यों Fair & Lovley ढूंढती हैं?


नदिया हमसे
ये सवाल पूछती है.
किसके पाँव पखारूँ?
वो नाम पूछती है.

पत्थर बन गया
एक सुन्दर सी नारी
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

यहाँ पत्थर पे भी
तुलसी चढ़ती है.
फिर क्यों भारत की लड़कियाँ
Fair & Lovley ढूंढती हैं?

परमीत सिंह धुरंधर

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?


हमसे बोलो
तुम्हे क्या चाहिए?
तुम पुत्र मेरे हो
तुम्हे ला के हम देंगें।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

पाकर तुम्हे प्रफुलित मन है
विराट होने का यही क्षण है
नस – नस में तुम्हारे
लहू है मेरा
नस – नस को तुम्हारे तृप्त करेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

अधूरा है आनंद का हर एक पल
जो मुस्कान न हो तुम्हारे मुख पे
चल कर खुद काँटों पे
पुत्र तुम्हारे लिए
हम हर पुष्प खिलायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

धुरंधर – सुशीला के
लाल हो तुम
तुम्हें यूँ तो व्याकुल
नहीं देख पायेंगे।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

भीषण होगा युद्ध
और वृद्ध हम होंगे
तब भी समर में
पुत्र तुम्हे
अकेला तो नहीं भेजेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

प्रिये हो तुम पुत्र, अति हमें
ये प्यार किसी और को
तो हम फिर ना दे पायेंगे।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय क्या है?
पुत्र तुम्हारे लिए
काल से भी हम टकरायेंगे।

In the memory of my father Dhurandhar Singh.

परमीत सिंह धुरंधर

कहूँगी मैं अलविदा


तन-मन-धन के मिलन से
एक नए सृजन पे
इस प्रकृति में
नविन, नूतन, नवरंग से
जब विकसित, पुलकित, पुष्पित
नव प्रकृति हो
तब तुम्हे चुम कर
नयनों को मूंदकर
कपकपाते अधरों से
कहूँगी मैं अलविदा।

बसंत -पतझड़
शीत -ग्रीष्म
उषा -निशा
में संग विहार कर
मल्हार कर
तरंगो -लहरों से
निर्मित, प्रस्फुटित
उष्मा -ऊर्जा से
शोषित-पोषित
संचित, सुशोभित
जब नव प्रकृति हो
तब तुम्हारी बाहों में
नयनों को मूंदकर
कपकपाते अधरों से
कहूँगी मैं अलविदा।

परमीत सिंह धुरंधर

हलाहल का ही इंतज़ार है


शहर की हर धुप में
जलन का अहसास है.

सुबह की किरण भी
रुलाती, तड़पाती और
तोड़ती हर आस है.

रात को तकिये पे
नींदें मेरी, पूछती अब
मुझसे ही अनगिनित सवाल है.

प्यास इस कदर आकर
ओठों पे बस गयी है मेरे
की कंठ को बस
हलाहल का ही इंतज़ार है.

परमीत सिंह धुरंधर

जवानी मजहबी हो गयी है


चाँद को सितारों में
कौन लाया है?
चलो, मिलकर बुलाते हैं.

ये शहर सबका है
इसे अपना कौन समझता है?
चलो, मिलकर पूछते हैं.

जवानी भी अब
मजहबी हो गयी है.
मगर, दूध सफ़ेद ही है.
चलो, मिलकर मिलावट करते हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


धुप में छाँव के जरुरत होती है
जितना पीता हूँ, प्यास उतनी बढ़ती है.

दिल अब भी तेरी यादो में है
जितना भूलता हूँ, याद उतनी आती है.

परमीत सिंह धुरंधर

स्त्रीत्व


जल-थल के बिना, नभ का क्या अस्तित्व है
मेरी प्यास ही, तुम्हारा स्त्रीत्व है.

परमीत सिंह धुरंधर