वक्त के बदलने से इंसान बदल सकता है
पर कर्म के बदलने से भगवान बदल सकता है.
परमीत सिंह धुरंधर
वक्त के बदलने से इंसान बदल सकता है
पर कर्म के बदलने से भगवान बदल सकता है.
परमीत सिंह धुरंधर
राम जी ने भी लक्ष्मण से कहा था, “मिट्टी में लोटना ज्यादा आनंददायक और मीठा है, वनिस्पत रण में दुश्मन को बांधना।”
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसी चढ़ी जवानी सखी,
की हाहाकार मचा दूंगी।
पतली कमर के लचक पे अपनी
सखी, चीत्कार मचा दूंगी।
तरस रहे हैं,
आरा – बलिया के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर
संग खाट बिछा लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।
आह उठने लगी है
मेरी गदराई जवानी पे.
खेत और खलिहान सब सखी,
अपनी चोली से सुलगा दूंगी।
तरप रहे हैं,
गोरखपुर – धनबाद के बाबूसाहेब
मैं तो छपरा के धुरंधर से
चोली सिला लूंगीं।
मैं तो छपरा के धुरंधर संग
विवाह रचा लूंगीं।
परमीत सिंह धुरंधर
मंडप से दुल्हन के भाग जाने पे कैसा लगता है? आज विराट कोहली को वैसा ही लग रहा है.
परमीत सिंह धुरंधर
तीक्ष्ण नैनों के बाण चलाकर
मृग-लोचन से मदिरा छलकाकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”
नितम्बों पे वेणी लहराकर
वक्षों पे लटों को बिखराकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”
शर्म-हया-लज्जा में अटखेली घोलकर
नवयौवन के रस में मादक पलकों के पट खोलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”
जोबन के दंश को सहकर
सुडोल अंगों को आँचल में सहेजकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”
ह्रदय में मिलान की तस्वीर सजोंकर
विरह में प्रिय के जलकर
वो तरुणी बोली, “हे पथिक, तुम किस पथ के गामी हो?”
मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”
परमीत सिंह धुरंधर
पनघट पे जो प्रेम मिला, वो कहाँ है इन मयखानों में?
सारा मेरा सागर सोंख गयी वो रात की पायजेबों में.
वो घूँघट से झाँकती, मुस्काती आँचल के ओट से
वो लचक कमर की अब कहाँ इन मदिरालय की अप्सराओं में.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे ह्रदय की गति को बढ़ाकर
वो तरुणी अपनी संचित मुस्कान बिखेरकर
बोली, “हे पथिक, किस पथ के गामी हो?”
किस ग्राम के वासी हो?
हे प्यासे, थोड़ा अपनी प्यास बुझा लो
ये वन नहीं, यहाँ तुम्हे भय नहीं
सो मृग सा अपनी पलकों को थोड़ा झपका लो.
तुम्हारे गोरे मुख को
ग्रास रहा है सूर्य अपने तप से.
और थकान मदिरा घोल रहा है
तुम्हारे नस- नस में.
अविवाहित हो क्या?
जो इतना उतावलापन है.
गठरी को धरा पे रख
इस वटवृक्ष के तले थोड़ा सुस्ता लो.
कहो तो घर से रोटी – मीठा ला दूँ
हलक के साथ – साथ, उदर की
जठराग्नि को भी मिटा लो.
परमीत सिंह धुरंधर
ए मौसम देख ज़रा
क्यों मेरा रंग है खिला – खिला?
ऐसी चढ़ी जवानी मुझपे
रखती हूँ मैं चोली का बटन खुला – खुला।
कितने भौरें तड़प रहें?
कितने भौरें हैं तरस रहें?
ए मौसम देख ज़रा
मेरे वक्षों पे है बसंत नया – नया.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरा कौवा काला – काला
ढूंढे कोई मधुशाला
जहाँ मदिरा हाँ पिलाये
कोई कमसिन सी एक बाला।
दो नयना हो तीखे – तीखे
और वक्षों के मध्या
चमके कोई छोटा
सा तिल एक काला।
फिर पंख फैला के
उड़ जाए आसमा में
चोंच के मध्या दबा के
चोली का कोई धागा।
तुमने ऐसा प्यासा छोड़ा
नासूर बन गया फोड़ा
अब तो ये प्यास मिटती नहीं
चाहे जितना भी पिलाती मेडोना।
तेरी आँखों का जादू
लूट ले गया मेरा पूरा काबुल
पतली कमर तूने हिला के
ऐसे मारा दिल पे हथोड़ा।
सब कहते हैं मैं हूँ पागल
तूने ऐसे छनकाया अपना छागल
डोली चढ़ गयी किसी और के
मुझको खिला के गरम पकोड़ा।
सत्ता में हैं मोदी
यूपी को संभाले योगी
मुझको तूने ऐसे नचाया
जनता को नचाये जैसे
केजरी – ममता – और माया।