बिहारी कौवा इश्क़ में


कौवा बोलै इश्क़ में
तुझे प्यार करूँगा लेके risk मैं.

काला हूँ पर हूँ बिहारी मैं
गोता लगाता हूँ बड़ा तीव्र मैं.

परमीत सिंह धुरंधर

घर बसाऊं कैसे?


राजा, आँखों में तेरे प्यास बहुत है
डरता है दिल, शर्म उतारूं कैसे?

तू लगता है शातिर, चालक बहुत है
घूँघट मैं अपना उठाऊं कैसे?

राजा, तू है एक निर्दयी, तुझमे अहंकार बहुत है
अपने वक्षों से आँचल सरकाऊ कैसे?

तेरे नजर है बस जिस्म पे, जिसे पाना आसान बहुत है
ऐसे हरजाई संग घर बसाऊं कैसे?

परमीत सिंह धुरंधर

सैया मेरा काला – काला


सैया मेरा काला – काला, काला – काला सा
चौसठ की उम्र में ढूंढे सोलह की बाला।
ढल गयी मेरी जवानी, चुल्लेह पे बैठे – बैठे
वो खाट पे बैठे – बैठे ढूंढे रोज मुर्ग – मशाला।

परमीत सिंह धुरंधर

सफ़ेद दाढ़ी का गम


जिंदगी के गम को कुछ यूँ भुलाता हूँ
अपनी सफ़ेद दाढ़ी पे उन के हुश्न का रंग लगाता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

मोदी और ममता


तन्हाइयों में शहनाइयाँ बजने लगे
मोहब्बत ऐसे मुकाम पे आ गयी है.
मैं मोदी सा खामोश हो गया
और वो ममता सी गठबंधन में आ गयी है.

परमीत सिंह धुरंधर

ईसा में राम, राम में ईसा


अजनबियों की दौलत मैं उठाता नहीं
और अपनों से मैं कुछ चुराता नहीं।
मेरा खुदा भी कहता है की Crassa
इस सांचे से फिर ऐसा कोई ढलता नहीं।

माना की विफल बहुत है जीवन में
मगर मयखाने में मंदिर, मंदिर में मयखाना
यूँ तो कोई और करता नहीं।
ईसा में राम, राम में ईसा
ऐसे तो कोई टूटा आशिक़ देखता नहीं।

परमीत सिंह धुरंधर

औरत


ए औरत, तू भी क्या चीज़ है?
तुझे बेवफा बना के, खुद बीमार है खुदा।

परमीत सिंह धुरंधर

जन्नत लुटाने को तैयार है खुदा


तुझे जवान करके, परेशान है खुदा
जिस रात से देखा है, हैरान है खुदा।

क़यामत लाने वाला, जाने कब लाएगा?
मगर आज क़यामत का शिकार है खुदा।

तेरे अंगों पे जब फिसलते हैं बादल की बूंदें
तो अपनी ही किस्मत पे शर्मशार है खुदा।

जन्नत खुद के लिए, और गरीबी इंसानों को दे दी
तेरे अंगों को चूमने के लिए, जन्नत लुटाने को तैयार है खुदा।

परमीत सिंह धुरंधर

जय गणपति


रूप विराट, नयन विशाल
तेज ललाट पे स्वयं सूर्य सा.

देवों के देव, प्रथम पूज्य
आशीष प्राप्त तुम्हे
स्वयं शक्ति-महादेव का.

परमीत सिंह धुरंधर

हे गणपति अब तो पधारो


हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

हे गजानन, हे वक्रकुंड
अब तो रख दो मस्तक पे हाथ ही.
कुछ तो मिले सहारा प्रभु देवव्रता
कब तक भटकता रहूं?
मरुस्थल में यूँ असहाय ही.

एक आपका नाम जपकर हे गौरीसुता
सबका बेड़ा पार हुआ.
कब तक मैं पुकारूँ आपको हे गदाधर?
छूट रहा मेरा सांस भी.

आपका – मेरा अनोखा है रिश्ता, हे गजकर्ण
आप मेरे अग्रज, आप ही सखा
आप ही मेरे भाग्या भी.

अब तो निष्कंटक कर दो
पथ मेरा, हे गणाधाक्ष्य
बिन आपके इक्क्षा और आशीष के हे चतुर्भुज
रख नहीं सकता मैं एक पग भी.

हे गणपति अब तो पधारो
टूट रहा मेरा आस भी.
निरंतर असफलताओं के मध्य, हे अवनीश
कब तक करूँ और प्रयास भी?

परमीत सिंह धुरंधर