काली उसकी अँखियों में रस है भर रहा,
मैं पीने गया तो उसने आँखे मूँद ली.
उसके अधरों पे अमृत है बसा,
मैं पीने गया तो उसने घूँघट घींच ली.
परमीत सिंह धुरंधर
काली उसकी अँखियों में रस है भर रहा,
मैं पीने गया तो उसने आँखे मूँद ली.
उसके अधरों पे अमृत है बसा,
मैं पीने गया तो उसने घूँघट घींच ली.
परमीत सिंह धुरंधर
तू 24 की ओय क्या बात है
40 में भी मुझमे वो ही उबाल है.
परमीत सिंह धुरंधर
16 साल की गुड़ी, नीले सलवार में,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
पतली कमर पे दो जोबन को उछाल के,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
नाजुक बदन पे नखरे हजार के,
अँखियों से निकले बस तीखे ही बाण रे,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
काँटों से कटीली पूरी रास की खान रे,
ले गयी दिल मेरा हाय, डाल अँखियों को आँख में,
मैं पूछता ही रहा पता, वो गयी हंस के टाल रे.
परमीत सिंह धुरंधर
ना गुरु गोबिंद जी होते,
तो ना झेलम में पानी होता,
ना ये धरती होती,
जिसपे गाँधी का नाम होता।
ऐसी सरहदें घींच गए,
वो अपनी तलवारों के बल पे,
की कोई भी,
अहिंसा में बल दिखा गया.
जिसने चुनवा दिया,
अपने दो – दो पुत्रों को दीवारों में,
उससे भी बड़ी त्याग की परिभाषा क्या?
ऐसी सरहदें घींच गए,
वो अपनी तलवारों के बल पे,
की कोई भी,
कपड़ों का त्याग कर महान बन गया.
परमीत सिंह धुरंधर
नवम्बर का महीना था,
दिसंबर का इंतज़ार था,
वो बोलीं,
जनवरी में मेरी हो जायेंगीं।
एक चिठ्ठी पहुँची,
फरवरी में घर मेरे,
की 14 को,
वो किसी और की हो जायेंगीं।
परमीत सिंह धुरंधर
किताबे खुली रखो,
दिल को बाँध के रखो,
वो अभी – अभी जवान हुई हैं,
उनसे बस रातों का रिस्ता रखो.
वो जितना चाहें,
गीत गाती रहें वफ़ा के.
तुम उनसे अभी,
ना इसकी उम्मीदें रखो.
परमीत सिंह धुरंधर
तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा काम है बरसना।
तू 46 में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
मौसम,
तेरे मुस्कुराने से बदलता है,
दिल राइट विंग से,
लेफ्ट विंग में धड़कने लगता है.
तेरा अंदाज है कातिलाना,
मेरा शौक है आजमाना।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
तुम्हारा नाम है बरखा,
मेरा नाम है Crassa।
तू ४६ में भी ऐसी,
की दिल चाहता है,
तेरे संग बहकना।
परमीत सिंह धुरंधर
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ताड़ी लोटा से,
तू चोलिये से ताड़ी पीयह।
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई पीये ओठवा से,
तू अंग-अंग से पीयह।
जीयह हो Crassa भाई जीयह,
फगुआ के मज़ा लूटाह।
सब कोई तोड़े पलंग,
तू देवाल के ही ढाहह।
परमीत सिंह धुरंधर
वो वक्ष नहीं,
जो विशाल ना हो.
अनंत तक जिसका,
विस्तार ना हो.
जिसपे क्राससा जैसा भ्रमर,
नितदिन करता रसपान ना हो,
विश्राम ना हो.
ग्रीष्म क्या, शरद ऋतू क्या?
वो वक्ष नहीं,
जिसपे हर क्षण विकसित,
कोई वसंत ना हो.
वो यौवन क्या?
जिसको अपने वक्षों पे गुमान ना हो.
और वो वीर ही क्या?
जिसके जीवन में वक्षों से संग्राम ना हो.
परमीत सिंह धुरंधर
सारा – शहर है मेरी नजर पे फ़िदा,
तुम कैसे बचोगे, कब तक ?
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
ना पिघलूंगा, जब तक ना उतरेगी मेनका।
पत्थर बनके कहीं मिट ना जाओ,
चख लो समंदर का अमृत ज़रा.
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
रचूंगा नया सवर्ग अपना।
ढल जाएगा यौवन, तो हाथ मलना पडेगा,
देख – देख के छलकता गागार यहाँ।
विश्वामित्र का वंशज हूँ,
अनंत तक चमकूंगा बांके सितारा।
परमीत सिंह धुरंधर