गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है


मधुर तेरी मुस्कुराहट का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.
शीतलहर में तेरा यूँ चलना लचक – लचक,
यूँ इठला – इठला के रुकने,
और मुड़ने का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.

गोरु – पखेरू सब सिथिल पड़े हैं,
बस एक तू ही है जो ज्वाला बनी है.
तेरे अंग – अंग के ज्वार का हमें राज पता है,
गोरी तेरे वक्षों से कोई खेल रहा है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अभिमान – अहंकार


जब पुत्र ही हूँ मैं धुरंधर सिंह का,
तो अभिमान मेरे मस्तक पे है.
और शिष्य ही रहा हूँ जब,
सीताराम – कास्बेकर का,
तो अहंकार मेरे नस – नस में है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बलिदान हो – बलिदान हो – 3


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

है अगर भय तुम्हे,
तो खुद से ही आज पूछ लो.
क्या है वो जिंदगी जिसके?
बेड़ियों में पाँव हों.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो रुक जाये वो धारा नहीं,
जो डूब जाए वो किनारा नहीं।
मानव हो तुम कोई पशु नहीं,
जो दर पे किसी के बंध जाए.
वो पौरष नहीं जिसका,
ना स्तुति, ना कोई गान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

जो भूल गए इतिहास अपना,
उनका कोई वर्तमान नहीं।
वो क्या मांगेंगे हक़ अपना जालिम से?
जिनको अपने लहू का आभास नहीं।
ये समर है उन वीरों का जिनका,
प्राण से बढ़कर मान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

बसंत


आज बसंत-पंचमी पे माँ सरस्वती को समर्पित मेरी बसंत पे पहली रचना।

चोली को संभाल गोरी, चोली को संभाल,
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।
खोल ले बटन राजा, खोल ले बटन,
आ गया है बसंत, डाल ले गुलाल।

डालूंगा गोरी तो फिर छोडूंगा नहीं,
फिर मत कहना लागे है तुझे लाज.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

मूँद लुंगी आँखे तू डाल ले धीरे से,
बस तोड़ ना देना राजा मेरी चोली का बटन.
आ गया बसंत, उड़ने लगा है गुलाल।

 

परमीत सिंह धुरंधर

कौटिल्या – विभीषण – महाभारत : An interesting triangle from Hindu history


अगर वक्षों से नियंत्रित सत्ता होने लगे,
तो किसी को कौटिल्या बनना पड़ता है.
अगर वक्षों पे लालायित सत्ता होने लगे,
तो किसी को विभीषण बनना पड़ता है.
अगर वीरों की सभा में चर्चा अंगों और वक्षों पे होने लगे,
तो किसी को महाभारत रचना पड़ता है.

 

परमीत सिंह धुरंधर

दर्जी एक प्यारा सा मामा बन गया


काली – काली आँखों दा इशारा हो गया,
चढ़ती जवानी को एक सहारा मिल गया.
लग गयीं बंदिशें जवानी पे उसके,
दुप्पट्टे को उसके उड़ा के जो कागा ले गया.

जाने क्या है आँखों के लड़ जाने में नशा?
बंद कमरों की सुनी दीवारों में भी,
मिल रही उसको हजारों खुशियाँ।
चर्चा है गली – मोहल्ले में हर कहीं,
अब तो डालनी होगी इसके पैरों में बेड़ियाँ।

तितली सी उड़ती थी जो हर जगह,
अब बैठी है कैद में बुलबुल सी.
लाडो – लाडो कह के बुलाती थी जिसे अम्मा,
अब दूर से ही दे जाती हैं खाना भाभियाँ।

सखियों से संदेसे अब छूट ही गए,
चूड़ियों के रंग कब के ढल भी गए.
अंकुरित स्वप्न जो ह्रदय में मचले थे,
सींचने से पहले ही उठा दी डोलियाँ।

अभी तो दर्जी संग सीखा भी न था,
चोली पे होली में रंग लगवाना
की दो – दो मेरे बच्चों का वो,
एक प्यारा सा मामा बन गया.

 

परमीत सिंह धुरंधर

ना कोई सौतन हो


सर्व धर्म समभाव हो,
भारत एक ऐसा गावं हो.
जहाँ एक तरफ गीता
और गुरु ग्रन्थ साहिब जी,
तो एक तरफ बाइबल
और कुरान का पाठ हो.

जहाँ सच्चे को आंच नहीं,
जहाँ दुष्ट को भी कष्ट नहीं।
जहाँ पर धन और पर नारी का,
किसी ह्रदय में लोभ नहीं।
भारत एक ऐसा गावं हो,
जहाँ किसी नारी का आँगन,
तोड़ने के लिए ना कोई सौतन हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों से ब्रह्माण्ड तक


मैं क्या जाम उठाऊं अपने हाथों से?
निगाहें इस कदर तेरे वक्षों पे जम गयी हैं.
इरादे कैसे बदल जाते हैं जीवन में?
मेरी ये धड़कने स्वयं आज जान गयी हैं.
अगर विष को धारण किये विषधर है ये,
तो भी मेरे अधरों पे एक प्यास जग गयी है.
या तो हर ले मेरे समस्त जीवन को,
इन वक्षों पे सुला के?
या नीलकंठ सा झूम लेने दे,
क्यों की ये सिर्फ वक्ष नहीं,
मेरा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बन गयी हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

अब तो दर्जी भी मेरा ना रहा


मेरी सखिया सब, अब कुँवारी ना रहीं,
बस एक मेरा ही निकाह अब तक न हुआ.
कैसे मिलूं रोज – रोज तुमसे यूँ चोरी – चोरी, छुपके?
की अब तो दर्जी भी मेरा ना रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

कोई अँचरा के हमार ना देख ले


तनी धीमा करीं आग के दुवरा पे,
कोई अँचरा के हमार ना देख ले.

पूछे लागल बारी राउर माई आजकल,
कहाँ जा तारु आधी रात के किवाड़ खोल के.

छोड़ दी आज खटिया के राजा जी,
बिछा लीं चटाई आज भुइयां में.

ना होइ इ खेला रोज – रोज अब हमरा से,
कब तक करीं इ झूठ और ढोंग सास – पतोह से।

जाप और योग करे सब कोई रउर – हमरा उम्र के,
बस हमरा के फँसाइले बानी रउरा इह पाप – कर्म में.

 

परमीत सिंह धुरंधर