किसी ने दाग से पूछा इश्क़ में दर्द को कैसे पालते हैं
दाग ने कहा, आवो, चलो Crassa से मिलते हैं.
हुश्न और इश्क़ पे तो सबने लिखा है, मीर से ग़ालिब तक
मगर आज के दौर में वो कलम हम रखते हैं.
RSD
किसी ने दाग से पूछा इश्क़ में दर्द को कैसे पालते हैं
दाग ने कहा, आवो, चलो Crassa से मिलते हैं.
हुश्न और इश्क़ पे तो सबने लिखा है, मीर से ग़ालिब तक
मगर आज के दौर में वो कलम हम रखते हैं.
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तुम शहर की सबसे चालक अप्सरा हो
दिल चाहता है की तुम्हारा ससुराल बस छपरा हो.
मेरी किस्मत न सही, किसी की तो किस्मत में हो
दिल चाहता है की तुम्हारे करीब कोई अपना हो.
मुश्किल नहीं है रात में दर्द को दबाना
बस दिन में एक बार तेरा दिख जाना हो.
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मौसम सा हैं वो या मौसम भी उसका मासूक है
कमर पे बादल और केशुवों में हवा महफूज हैं.
रुत बदले भी तो कैसे बिना तेरी अंगराई के
तेरी आँखों में सागर और कमर पे पुरवाई है.
उसका बांधना जुल्फ को यूँ फूलों से
क्या किसी ने कभी ऐसी चोट खाई है.
उड़ती हैं तितलियाँ जिसके दीदार पे
हमने तो उसकी एक ही नजर में होश गवाई है.
टूटे भी इश्क़ में तो गम नहीं,
मीठी मिलन के बाद ही दर्दे-जुदाई है.
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ये तो आगाज है और बेदम कर रहे हैं
वो थोड़ा बाहों में लेले तो सुकून से दम निकले।
RSD
वो जो अपनी जुल्फों में हैं रात को समेटे
गेसुओं को खोल दें तो मेरा चाँद निकले।
वो जो हया में अपने बंध के मंद-मंद मुस्करा रहे हैं
ये पर्दा हटा दें तो मेरा चाँद निकले।
हजारों आड़ावों से भरी है उनकी खिली जवानी
जरा जाम छलका दें तो मेरा चाँद निकले।
RSD
मेरा दर्द मेरी राहों का काटा बन रहा
प्यास मेरी मंजिल को धुंधला कर रहा.
आँखे इस कदर चौंधियाने लगी हैं
की ये शहर मुझे मेरे गावं से अलग कर रहा.
शोहरत की चाहत पगडंडियों पे चलके
तो मिलती नहीं।
और इनके सड़कों पे भागते मेरे पाँव
और ये थकान, मुझे मेरे ख्वाबों से दूर कर रहा.
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इस जिंदगी में कोई गुनाह कर ही नहीं पाए
इस कदर मोहब्बत किये बैठे थें.
वो आई, मिली, मुस्कराई और चली गयी
हम पहली ही नजर में सब कुछ लुटाये बैठे थे.
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जो वक्त को थाम ले वो नजर हैं उनकी
जो बच निकले हैं इनसे, कभी देखि हैं हालत उनकी।
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दिल को जलाकर पिए जा रहे हैं
बचा अब ना कुछ भी, पर जिए जा रहे हैं.
किसको पुकारे, कौन है यहाँ अपना
मुख को हाँ मोड़ें हाँ सभी जा रहे हैं.
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हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई जाने कहाँ लड़ाई आँख.
मैं बदली तेरे लिए और बदलती ही जा रही हूँ
फिर भी ना तू समझे मेरे मन की कोई बात.
हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई ज्जाने कहाँ लड़ाई आँख.
तुम्हारे पाँव को मैंने माना अपना संसार
पर तू भी मर्द वो ही जिसे भये बस बाजार।
मेरी प्रेम-क्षुधा को ठुकराकर
जाने ढूंढ रहा हैं किन गलियों में तू प्यार।
हर रात जला के दिया मैं तो बैठी तेरे साथ
फिर भी तू हरजाई जाने कहाँ लड़ाई आँख.
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