हालात कहाँ बदल रहें, ना तुम इन्हें बदलने दोगे।
इतने करीब आके भी एक दूरी तुम हमसे रख ही लोगे।
ना रखा करो लाल रंग कपड़ों का अपने जिस्म पे,
कहीं भोरें गुलाब समझ कर ना तुमसे लिपटने लगें।
परमीत सिंह धुरंधर
हालात कहाँ बदल रहें, ना तुम इन्हें बदलने दोगे।
इतने करीब आके भी एक दूरी तुम हमसे रख ही लोगे।
ना रखा करो लाल रंग कपड़ों का अपने जिस्म पे,
कहीं भोरें गुलाब समझ कर ना तुमसे लिपटने लगें।
परमीत सिंह धुरंधर
हमरा खटिया, हमरा खटिया,
हमरा खटिया पे ए राजा जी,
ऐसे ना जोड़ लगाईं।
टूट जाइ एकर पाया त,
माई हमके बड़ी सुनाई।
रउरा खातिर देखि का – का करSतानी ,
मिलSतानी रोजे चोरा के,
आ केवाड़ रखSतानी खोली के.
हमरा अंगना में ए राजा जी,
ऐसे ना रात बिताईं।
चूड़ी जे जाइ खनक त,
माई हमके बड़ी सुनाई।
कहS तानी रउरा से,
की जल्दी से शादी कर लीं हाँ.
ना त छोड़ीं हमार पीछा,
हमरो के अब बसे दीं हाँ.
हमरा जोबना, हमरा जोबना,
हमरा जोबना के ए राजा जी,
ऐसे मत बढ़ाईं।
दरजी कर दी शिकायत त,
माई हमके बड़ी सुनाई।
परमीत सिंह धुरंधर
वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
धरती को रंग दो ऐसे,
की कण – कण इसका लाल हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
वीरों की संतान हो,
ऐसा संग्राम तुम करो.
की गूंज हो हिमालय तक,
और आसमा तक शंखनाद हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
विजय की नहीं कामना,
अब मन में है.
धर्म की स्थापना,
ना अब अपना लक्ष्य ही है.
अब तो बस केवल,
रण-चंडी का आव्हाहन हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
अभेद किसका दुर्ग रहा,
जो भय अपने मन में हो.
विजय किसकी रही शास्वत,
जो अंत अपना बस पराजय में हो.
अपने लहू से लिख दो ऐसा इतिहास,
की पीढ़ियों को अभिमान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
जीवन का मोह त्याग कर,
साथ चले इस राह पर.
चाहे हिन्दू हों, या मुसलमान हो.
स्वतंत्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.
परमीत सिंह धुरंधर
जो पत्थरों को करता हो प्यार,
वो बिहारी है.
जो खुद से पहले दीवारों का करे श्रृंगार,
वो बिहारी है.
जो पशुओं के गोबर से,
घर – आँगन को चमका दे,
वो बिहारी है.
जो खुद के पहले,
पशुओं को नहला के खिला दे,
वो बिहारी है.
जो वक्त के आगे बिखरा हो,
पर हर वक्त पे हो भारी,
वो बिहारी है.
जो हो सीधा – सादा, सरल – सच्चा,
पर हर माया से हो मायावी,
वो बिहारी है.
जिसके आँखों में हो ताल,
सुर में हो संग्राम,
और धडकनों में हो इश्क़ की बिमारी,
वो बिहारी है.
जिसके नस – नस में नशा हो मिटटी का,
जो सतुआ से लेता हो ऊर्जा,
और मदहोस हो जाता हो पी के मठ्ठा,
वो बिहारी है.
जो भैसों पे प्रमेय सिद्ध कर देता हो,
जो चीनी संग रोटी खाता हो,
जो लिट्टी – चोखा – खिचड़ी का दावत देता हो,
वो बिहारी है.
परमीत सिंह धुरंधर
मेरे सीने पे चोट हो,
और दर्द उनके सीने पे.
ऐसा इश्क़ अब कहाँ?
लैला रो दे मजनू के गिरने पे.
परमीत सिंह धुरंधर
वक्त ने कुछ ऐसे
बिहारियों को बिखेरा है.
की कैलिफोर्निया से मारिसस तक
बस भोजपुर और भोजपुरिया का जलवा है.
जहाँ हर उम्मीद टूट जाती है
गहन अँधेरे के तले दब कर.
वहाँ भी हमने अपनी स्वर-संस्कृति-संगीत से
अपनी माटी का दिया जलाया है.
कुछ जलते हैं
कुछ हँसते हैं
कुछ हमें मिटाने की
हसरते पाले हैं.
मगर जंगली फूल ही सही
खुसबू विहीन, रंगहीन ही सही
हमने अपने खून -पसीने से
बंजर को भी गुलशन बनाया है.
परमीत सिंह धुरंधर
लचक होनी चाहिए जिंदगी में पतंगों सी,
दूर तक सफर करती हैं, कट के भी.
आसमाँ को छूने की ललक इतनी है,
की हवाओं का जोर जितना,
उतना ही ऊंचा हैं उठती।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरे नजरों के मयखानों में डूब जाऊं,
और तू ना निकलने दे.
अगर निकल जाऊं तो तू फिर,
किसी और नजर पे ना बहकने दे.
मुझे याद है तेरा,
जुल्फों को यूँ ही आगे – पीछे करना।
इन्हे अब मेरी रात बना दे,
या फिर बन घटा बन कर बरस जाने दे.
परमीत सिंह धुरंधर
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
करवाचौथ के उपवास हमारा नाम पे
हर सोमारी सावन के हमरे खातिर करत रहलू।
शिव जी से हमरे के माँगत हर बार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
अइसन कउनो ना इतवार नागा भइल,
जब तू ना हमारा बथान में ओंघाइलु।
हमरा बैलन के तू ख़ास प्यार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
खोटत हमरे खेतिया के साग रहलू,
हमरे बगिया के कचनार रहलू।
हमरे खटिया पे सवार रहलू।
याद करअ जहियाह कुंवार रहलू,
अंग – अंग से तू हमार रहलू।
परमीत सिंह धुरंधर
अंग – अंग खिल के कठोर भइल बा,
भौजी भैया से कह तनी ढूँढअस,
हमारा जोड़ के कोई लइका।
सखी – सहेली सब तहरा खानी,
जाके बइठ गइली अपना ससुरा,
केकरा संगे अब खेले जाईं सबके अँगना।
परमीत सिंह धुरंधर