बलिदान हो – बलिदान हो


वक्त की पुकार पे,
रक्त का दान हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

सर्प सा जीवन
बिल में संकुचित हो.
या नभ में अनंत तक,
विस्तृत हो विस्तार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

सोच लो, विचार लो,
सौ साल के जीवन में,
साँसों पे बोझ हो.
या शोषण की कालजयी बेड़ियों पे,
बन काल,
प्रहार हो, प्रहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

स्वर्ग से देवता नहीं आयेंगें योगदान को,
नारियों के गर्भ से ना निकलेंगें नारायण,
जो इंतज़ार हो, इंतज़ार हो.
हमें ही चुनना है अपने पथ को, अंत को,
मिटाने को ये गहन अन्धकार,
ना हो अब सूर्या का इंतज़ार,
अब मशाल लो, मशाल लो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

रूप – रंग का त्याग कर,
रण को प्रस्थान हो.
काम – क्रीड़ा को छोड़कर,
प्रेम से मुख मोड़ कर,
भय पर,
विजय हो, विजय हो.
नर ही नहीं केवल,
नारी के हाथों में भी कृपाण हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

गुरु ही नहीं,
अब माँ से भी अव्वाहन हो.
की पुत्रों को बतायें,
वे वीरों की संतान हैं.
सिंह सा गर्जन करें,
कल अपने संतान फिर,
निर्भीक – निर्भय भविष्य के लिए,
कुशाषकों का,
संहार हो, संहार हो.
स्वतन्त्रता पुकारती,
बलिदान हो – बलिदान हो.

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्षों पे बुद्ध सी है शांति


भीषण – प्रचंड अग्नि से
धधकते वक्षों पे बुद्ध सी है शांति।
स्वर्ण सा सुशोभित अंगों को
शर्म से हैं बांधती नैनों की पंखुड़ी।
चन्दन से शीतल नितम्बों पे
डोलती – फुफकारती
काले केसूओं की
समृद्ध – गहन कुंडली।
उम्र के पड़ाव पे
वृद्ध भी फिसल रहे.
कामाग्नि में जल कर
तरल बनी है जिंदगी।

पुष्प क्या ? पवन क्या ?
सूर्य, चंद्र, मेघ और नक्षत्र क्या?
कीट और पतंगे भी
डोल – डोल अंगों पे
रसपान कर रहे.
रुत है, रीत है
मन में पुष्पित प्रीत है.
बिन सावन के ही,
नस – नस में तरगों को
नयन उसके सिर्जित और प्रवाहित कर रहें.
धरा क्या? नभ क्या?
अंग – अंग
विश्व को पोषित और संचालित कर रहें।

 

परमीत सिंह धुरंधर

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 3 (दोस्त, उसकी पत्नी और आँखों पे पट्टी)


अंकुर: “भाई, कैसे तुम भाभी के साथ निभा पा रहे हो. मैं तो बोर हो गया हूँ और मेरी बीबी हर समय मुझसे लड़ती रहती है की अब मैं पहले सा नहीं हूँ. उसे प्यार नहीं करता हूँ.”
मैं: “अरे भाई, इसमें इतना चिंता की बात नहीं है. उन्हें हर पल रोमांटिक पल चाहिए, बस दे दिया करो.”
अंकुर: “वो ही तो कहाँ से लाऊँ? घर जाते ही वो मुझे कुछ नहीं करने देती और अपने बातों का पूरा बण्डल ले कर बैठ जाती है.”

फिर मैंने अंकुर को बताया की मैं घर जाते ही रश्मि की आँखों पे पट्टी बाँध के कही बैठा देता हूँ. उसके बाद अपने सारे काम ख़तम कर उसकी पट्टी खोलता हूँ. वो एक दम खुश हो जाती है और कहती है “How Roamntic!”

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कुछ दिन बाद अंकुर फिर मिला, मिलते ही बोला, “भाई सब गड़बड़ हो गया है.”
अंकुर:”मैंने बस एक दिन उसकी आँखों पे पट्टी बाँधा, उसके बाद से मैं जैसे ही घर जाता हूँ, वो ही मेरे आँखों में पट्टी बाँध के जाने घंटों – घंटों क्या करती है?”
मैं:”तो इसमें क्या दिक्कत है? मज़ा तो ले रहे हो ना तुम.”
अंकुर:”अरे नहीं भाई. पहले तो मुझे किसी के मेरे घर में चलने – होने का आभास होता था. अब तो मुझे ऐसा लगता है की कोई रात में मेरे घर में रहता भी है. वो पिछले छह महीने से मेरी आँखों की पट्टी अब वो सुबह में खोलती है.”
मैंने हँसते हुए कहा की भाई तो तुम खुद ही पट्टी खोल लो और देख लो कोई है की नहीं घर में. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ की तुम सुबह तक इंतज़ार क्यों करते हो.
अंकुर:”अरे वो मेरा हाथ – पैर सब बाँध देती है और बिस्तर पे डाल देती है. फिर मुझे छोड़ कर कही चली जाती है और सुबह में मेरी पट्टी खोलती है.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

शादी के बाद के हालात


मीठा और मिठाई से परहेज किसे है?
किसी को भी नहीं।
ये तो बस बीबियों के डर से लोगों ने,
अपने शौक दबा रखे हैं.

हालात कैसे हो जाते हैं शादी के बाद,
कोई हमसे पूछे।
हमने 2018 के स्वागत में लबों की प्यास,
मय से नहीं नींबू – पानी से मिटायें हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

गर्भ से ही निकला हूँ करके तैयारी


जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।
श्री राम, परशुराम, मेघनाथ, भीष्म, कर्ण,
अब है अभिमन्युँ की बारी।

बस पिता ही पूज्य हैं इस जीवन में,
बस वो ही विराजमान हैं ह्रदय में.
स्वीकार है, हर जख्म – हर घाव,
पुरस्कार है मौत भी इस पथ पे.

कितने भी हो आप भयंकर योद्धा,
महारथी और चकर्वर्ती,
क्या बांधेंगे मुझे इस चक्रव्यूह में?
गर्भ से ही निकला हूँ करके इसी दिन की तैयारी।
जो प्रेम करता है पिता से,
वो होता है विलक्षण – प्रलयंककारी।

 

परमीत सिंह धुरंधर

खा जातें हैं धोखा हर बार.


हमें शौक है ए समंदर तेरे किनारों का
मगर रखते हैं अब भी हौसला
तेरी लहरों को बाँध के रखने का.

हम खा जातें हैं धोखा, ये सही है
प्रेम में बंध कर हर बार.
मगर कोई नहीं है ऐसा जो रखता हो
ताकत मेरे संसार को डुबोने का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ मुझे विरक्ति दे


शक्ति दे
भक्ति दे
दे माँ
मुझे विरक्ति दे
काम से
क्रोध से
विश्राम से.

ज्ञान दे
अनसंधान दे
दे माँ
मुझे प्रमाण दे
श्रिष्टि का
समृद्धि का
कृति का.

अनुगृहीत कर दे
विकसित कर दे
कर माँ
मुझे तृप्त कर दे
अपनी माया से
अनुराग से
अपने प्रसाद से.

 

परमीत सिंह धुरंधर

माँ औलादें पाल ही लेतीं है


माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं
चाहे परिस्तिथियाँ कैसे भी हो.
माँ चाहे बूढी हो
झुकी कमर हो
हड्डियों में बुढ़ापे का दर्द
और ठण्ड का असर हो
पर खिसक – खिसक कर
चूल्हे में आग डाल ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं है.

सुख से, दुःख से
हंस कर या रो कर
अपने – पराये सबसे लड़कर
माँ अकेले, जूझते हुए
वक्त के हर सितम को सहकर
अपने बच्चों को बड़ा कर ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

जब सबकी आँखों में निंद्रा का यौवन हो
और नशों में आलस्य की मदिरा हो
सूरज भी जब ना निकल सके
उन गहन अंधेरो को चीरकर
थकान से टूटते जिस्म में
माँ स्फूर्ति भर ही लेती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

अपनी भूख दबाकर
अपनी अभिलाषाओं का दमन कर
मैली – कुचैली, फटी साड़ी में भी मुस्कराकर
चार दीवारों में बंध कर
सिमटी जिंदगी के बावजूद
हर पल उल्लास से भरकर
अपने बच्चों के लिए
रात – दिन, दोपहर
माँ रोटी सेंक ही देती है.
माँ
औलादें पाल ही लेतीं हैं.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शयनकक्ष के झरोखे से : भाग – 2 (पत्नी और उसकी बिछड़ी बहन)


रश्मि, “क्या जी आज कल किसके साथ लगे रहते हो फ़ोन पे. घर पे कोई तुम्हारे साथ है, उसपे भी कोई ध्यान दे दो.”
मैं, “अरे ध्यान तो तुम ही नहीं देती। जैसे भी रात होती हो, तुम तो अपने दर्पण की बाहों में चली जाती हो.”
रश्मि,”सुनो, मैं सही में पूछ रही हूँ. कौन है, किसके साथ तुम ये बात करते हो? मैं अपने जीवन में कोई और किस्सा नहीं चाहती।”
मैं, “हंस कर अरे तुम भी ना. अरे ये कोई नहीं, सुजाता है.”
रश्मि ने पहली बार दर्पण को छोड़कर, मेरी तरफ मुड़कर अपनी दोनों आँखों से सीधे – सीधे देखते हुए पूछा की ये सुजाता कौन है, और मैं कब मिला।
मैं भी अचंभित की क्या हो गया इसको।
मैंने पता नहीं क्यों बिना मज़ाक किये या बात को बढ़ाये ही उसे बताना उचित समझा की सुजाता कौन है. शायद एक साल के साथ के बाद हर पति समझ जाता है की पत्नी को ना छेड़ा जा सकता है न ही उससे मज़ाक किया जा सकता है. तभी तो घर के बाहर कोई चाहिए एकांत में छेड़खानी के लिए. शादी के बाद के अवैध संबंधों का ये ही कारण है.
मैंने कहा, “अरे तुम्हारी छोटी बहन, मेरी साली सुजाता।”
दो मिनट की मौन के बाद सायद उसे एहसास हो गया की मैं क्या सोच रहा हूँ.
उसने कहा, “अरे तो सीधे बोलो न की मेरी बहन से बात करते हो. यहाँ तो हर गली – गली में कितनी सुजाता होंगी। और इतना क्या रोज – रोज मेरी बहन से बात करोगे, की मैं समझ जाऊं। मुझे तो अभी भी शक है और सुजाता ने मुझे तो तभी तुम्हारी कोई कही बात नहीं बोली की मैं शक ना करूँ।”

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रश्मि, “सुनो, आज तुम्हारी सुजाता से बात हुई थी या आज कल बंद है.”
मैंने, “हुई थी बाबा, वो रोज मुझे दफ्तर में भी कॉल कर देती है, अगर मोबाईल पे रिप्लाई न दूँ.”
रश्मि, “लेकिन आज मुझे दो घंटे बात हुई. मैंने कितनी बार तुम्हारा नाम लिया। कितना उससे पूछा, कितना तुम्हारे बारे में मैं बोली। उसने तो कुछ भी नहीं कहा.
मैं, “अरे मुझे क्या पता, तुम बहनों में क्या है?”
रश्मि, “मुझे अपना फ़ोन दो और उसका नंबर दिखावो, मुझे पूरा यकीन हैं ये सुजाता शायद मेरे कुम्भ के मेले में बिछड़ी बहन है. मुझे भी अब उससे मिलना है.”
मैंने पुरे आत्मविश्वास के साथ सर झुका कर फ़ोन उसको सौंप दिया।
पूरी जॉंच – पड़ताल के बाद फ़ोन मुझे सौंपते हुए रश्मि बोली, “चाय पीनी है.”
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो रसोई की तरफ जाती बोली, “पकोड़े भी बना देती हूँ, बहार ठण्ड हैं.”

 

परमीत सिंह धुरंधर

 

नशा जीवन का


कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो रिश्तेदारों के कहकहे,
वो दादा – दादी की कहानियाँ।
वो नौक – झौंक,
वो रुस्सा – रुसववाल।
वो आँगन में दो चूल्हे,
और एक थालियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो खपरैल के घर में,
खुले आँगन में,
गीत गाती लड़कियाँ।
सिलवट पे हल्दी पिसती,
चूल्हे पे खांसती,
वो जाँत और मुसल,
चलाती भाभियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

वो दो पतोह की सास बन चुकी,
ससुराल से मायके आयी,
लड़की को देखने उमड़ी भीड़.
और उस भीड़ में,
बूढ़े हो चले दामाद को,
दबाती, चींटी काटती नारियाँ।

कहाँ है वो नशा जीवन का?
वो खुशियाँ, वो मस्ती,
वो मज़ा जीवन का.

 

परमीत सिंह धुरंधर